शिक्षा का आधार (Foundation of Education)

शिक्षा का आधार (Foundation of Education)

विभिन्न दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों एवं वैज्ञानिकों ने शिक्षा प्रक्रिया की व्याख्या करने में मूल भूमिका अदा की है। सबने अपने-अपने दृष्टिकोण से शिक्षा को देखा है और परिभाषित किया है। शिक्षा के आधार (Foundation of Education) निम्नवत हैं –

शिक्षा का दार्शनिक आधार (Philosophical Foundation of Education)

मनुष्य दर्शन का केन्द्र होता है। दार्शनिक मनुष्य के व्यवहारों, उसके वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करते हैं और मनुष्य के जीवन का लक्ष्य तय करते हैं। दार्शनिक मनुष्य के जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति का साधन भी तय करते हैं और इन सभी बातों के ज्ञान एवं प्रशिक्षण के लिए वे शिक्षा को अत्यावश्यक बताते हैं।

अत: हम यह भी कह सकते हैं कि दार्शनिकों की दृष्टि से शिक्षा मनुष्य के जीवन के अन्तिम उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है। विभिन्न दर्शन मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भिन्न-भिन्न मानते हैं।

आध्यात्मवादी मनुष्य के लौकिक जीवन से ज्यादा उसके पारलौकिक जीवन को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। वेदांती, लौकिक जीवन से सदा के लिए छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हैं और इसे मुक्ति नाम देते हैं।

भौतिकतावादी मनुष्य के लौकिक जीवन को ही सत्य मानते हैं। भौतिकतावादियों के अनुसार सुखपूर्वक जीना ही मनुष्य के जीवन का अन्तिम उद्देश्य है। इनके अनुसार सुखपूर्वक जीने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य शरीर एवं मन स्वस्थ हो और साधन सुविधा सम्पन्न हो। भौतिकवादी दृष्टि में शिक्षा, “शिक्षा वह है जो मनुष्य को सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने योग्य बनाती है।”

पाश्चात्य प्रकृतिवादी दार्शनिक शिक्षा को भौतिक सुखों की प्राप्ति का साधन मानते हैं वे मनुष्य को अपने अंतःकरण एवं बाहरी पर्यावरण से समन्वय स्थापित करने पर बल देते हैं। स्पेन्सर कहते हैं, “शिक्षा का अर्थ अन्तःशक्तियों का बाह्य जीवन से समन्वय स्थापित करना ही शिक्षा है।”

कुछ पाश्चात्य दार्शनिक मनुष्य के वास्तविक रूप में देखते हैं। प्रयोजनवादी मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहते हैं और उनका मानना है कि मनुष्य में वर्तमान समाज में अनुकूलन करने और भविष्य के समाज का निर्माण ही शिक्षा का कार्य प्रयोजनवादी जॉन डीवी ने कहा है- “शिक्षा व्यक्ति की उन सभी योग्यताओं का विकास है जो उसमें अपने पर्यावरण पर नियंत्रण रखने तथा अपनी सम्भावनाओं को पूर्ण करने की सामर्थ्य प्रदान करे।”

शिक्षा का आधार (Foundation of Education)
शिक्षा का आधार (Foundation of Education)

शिक्षा का समाजशास्त्रीय आधार (Sociological Foundation of Education)

समाजशास्त्री समाज को केन्द्र मानकर विचार करते हैं ये व्यक्ति को समाज के परिपेक्ष्य में ही देखते हैं। शिक्षा को ये व्यक्ति और समाज को विकास का साधन कहते हैं। समाजशास्त्रियों के विचार में शिक्षा के विषय में निम्नलिखित बातें कहीं हैं-

शिक्षा एक अनवरत प्रक्रिया है

समाजशास्त्रियों का मानना है कि शिक्षा समाज में सदैव चलती रहती है। मनुष्य के जन्म के कुछ दिनों बाद से ही शिक्षा प्रारम्भ हो जाती है और मनुष्य के जीवन के समाप्त होने तक शिक्षा की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। उनका मानना है कि मनुष्य तो आते-जाते रहते हैं लेकिन शिक्षा प्रक्रिया तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है वह रूकती नहीं है। अतः शिक्षा एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है

समाजशास्त्रियों का मानना है कि शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है, क्योंकि मनुष्य समाज में एक दूसरे के सम्पर्क में आकर ही एक दूसरे की भाषा विचार और आचरण से प्रभावित होते हैं, इसी प्रक्रिया को हम सीखना कहते हैं और सोद्देश्य सीखने की प्रक्रिया ही शिक्षा कहलाती है।

मनुष्य में कुछ सामान्य शक्तियां ऐसी होती हैं जो वह जन्म के साथ ही लेकर आता है, प्राकृतिक एवं सामाजिक परिवेश में वह इन शक्तियों का विकास करता है और मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन होते रहते हैं। बोलने की शक्ति तो मनुष्य में जन्म से ही रहती है। लेकिन भाषा का विकास उसके अपने समाज से ही हो पाता है जिससे वह अपने विचारों को प्रकट करता है।

मनुष्य में सभ्यता और संस्कृति का विकास समाज से ही होता है। समाज के अभाव में मनुष्य में भाषा शक्ति एवं विचार शक्ति का विकास नहीं हो पाता है। शिक्षा समाज के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन है। जैसा समाज होता है वैसी ही उसकी शिक्षा होती है।

समाज के भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों का सम्बन्ध शिक्षा से ही होता है। शिक्षा के द्वारा समाज के भूत का ज्ञान होता है, वर्तमान के आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और शिक्षा भविष्य के निर्माण में सहायक है। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है।

शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है

शिक्षा के द्वारा मनुष्य की सभ्यता एवं संस्कृति में लगातार विकास होता है। एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित शिक्षा के द्वारा ही होता है। शिक्षा के स्थानांतरण के लिए समाज विद्यालय का सहारा लेता है। एक विशेष काल की विद्यालयी शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यचर्या एवं शिक्षण विधियां सब निश्चित होते हैं।

समाज में परिवर्तन के साथ ये सभी कारक बदलते रहते हैं। आवश्यकता के अनुसार समाज शिक्षण विधियों, पाठ्यचर्या एवं शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन होता रहता है।

शिक्षा एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है

समाजशास्त्रियों के अनुसार शिक्षा में एक पक्ष के प्रभावित होने पर दूसरा पक्ष भी प्रभावित होता है। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा प्रक्रिया के दो ध्रुव हैं। एक पक्ष प्रभावित करता है और दूसरा पक्ष प्रभावित होता है। जान डीवी ने भी शिक्षा के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक दो ध्रुव माने हैं।

सामाजिक अंग का अर्थ सामाजिक वातावरण है एवं मनोवैज्ञानिक अंग का अर्थ उसके सीखने की रूचि एवं रूझान से है। केवल सामाजिक वातावरण ही नहीं बल्कि प्राकृतिक वातावरण भी शिक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

नियोजित शिक्षा में शिक्षक, शिक्षण के उद्देश्य, पाठ्यचर्या आदि शिक्षा को प्रभावित करते हैं। ये सीखने-सिखाने की परिस्थितियां कहीं जाती हैं। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा की प्रक्रिया सीखने वाले और सीखने सिखाने की परिस्थितियों के बीच चलती रहती है।

शिक्षा, विकास की प्रक्रिया है

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसका व्यवहार पशु की भांति होता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है। विस्तृत दृष्टिकोण से देखा जाए तो मनुष्य अपने अनुभवों को भाषा के आधार पर सुरक्षित रखता है और इनको आने वाली पीढ़ी को सौंप देता है। आने वाली पीढ़ी इस ज्ञान को और आगे बढ़ाती है और अपने विचार और ज्ञान तथा अनुभव को भी उसमें जोड़ देती है।

इसी तरह किसी भी समाज की सभ्यता एवं संस्कृति का विकास एवं निर्माण होता है जो शिक्षा के बगैर सम्भव नहीं है। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा विकास की एक प्रक्रिया है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के लोगों के बीच रहकर एवं उनका अनुकरण करके, उनसे सीखकर,  उनके अनुसार रहना, खाना, बोलना चलना और अन्य बातें सीखता है।

पशुओं के जीवन पर विचार करने पर हम पाते हैं कि ये जन्म के कुछ दिन बाद ही अपनी जाति के पशुओं की भांति सभी तरीके सीख जाते हैं लेकिन यह प्रक्रिया केवल जीवन यापन एवं आत्मरक्षा के कार्यों तक सीमित रहती है। जबकि मनुष्य केवल परिस्थितियों से समायोजन ही नहीं सीखता है, अपितु वह अपने आपमें अनुकूलन करने की क्षमता का विकास भी करता है।

शिक्षा मनुष्य के खाने-पीने रहने, चलने-बोलने तथा जीवन को सुखमय बनाने में सहयोग करती है और इसी का दूसरा नाम विकास भी है। अतः शिक्षा मनुष्य के विकास का आधार है।

शिक्षा का राजनैतिक आधार-(Political Foundation of Education)

राजनीतिशास्त्री राज्य और राज्य के शासनतंत्र को आधार बनाकर कार्य करते हैं। वे व्यक्ति एवं समाज दोनों को राज्य और उसके शासनतंत्र के परिपेक्ष्य में देखते हैं। राजनीतिशास्त्री शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का साधन मानते हैं। अच्छे राष्ट्र का निर्माण अच्छे नागरिकों से होता है और नागरिक शिक्षा के द्वारा ही अच्छा नागरिक बन सकता है। राजनीतिशास्त्रियों के अनुसार, “वास्तविक शिक्षा वही है जो अच्छे नागरिकों का निर्माण करती है।”

शिक्षा का वैज्ञानिक आधार-(Scientific Foundation of Education)

भौतिक जगत एवं भौतिक वस्तुएं वैज्ञानिकों के विचार का केन्द्र होती हैं। वैज्ञानिक किसी भी वस्तु एवं क्रिया को वस्तुनिष्ठ ढंग से देखते वैज्ञानिक मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के प्रश्न पर तो मनोवैज्ञानिकों से सहमत होते हैं लेकिन बात जब व्यवहार की होती है तब ये समाजशास्त्रियों का समर्थन करते हैं। वैज्ञानिक, शिक्षा को मनुष्य की बाह्य परिस्थितियों से अनुकूलन एवं विकास के साधन के रूप में स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार, “शिक्षा का अर्थ आन्तरिक शक्तियों का बाहरी जीवन से समन्वय स्थापित करना है।”

शिक्षा का आर्थिक आधार-(Economical Foundation of Education)

समाज का आर्थिक श्रोत एवं तंत्र अर्थशास्त्रियों के विचार का केन्द्र होता है। ये मनुष्य एवं समाज की सभी क्रियाओं को आर्थिक आधार पर देखते हैं। अर्थशास्त्री शिक्षा को एक उत्पादक क्रिया मानते हैं। शिक्षा उत्पादन का कारक एवं उपभोग की वस्तु मानी जाती है।

शोध प्रमाणित कर चुके हैं कि शिक्षित मनुष्य की उत्पादक क्षमता अशिक्षित व्यक्तियों की तुलना में अच्छी और गुणवत्तावाली होती है और यह अंतर इतना ज्यादा होता है कि उससे होने वाला अतिरिक्त लाभ उसकी शिक्षा पर किये गये व्यय से अधिक होता है।

अर्थशास्त्री शिक्षा में किये गये निवेश को अच्छा आर्थिक निवेश मानते हैं। इनके अनुसार- शिक्षा एक आर्थिक निवेश है जिसके द्वारा व्यक्ति में संगठन एवं उत्पादन के कौशलों का विकास किया जाता है और इस प्रकार राष्ट्र, समाज एवं व्यक्ति की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाती है और राष्ट्र, समाज एवं व्यक्ति का आर्थिक विकास किया जाता है।

शिक्षा का मनोवैज्ञानिक आधार-(Psycological Foundation of Education)

भारतीय मनोवैज्ञानिकों के विचार का केन्द्रबिन्दु मनुष्य का बाह्य स्वरूप और उसका अंतःकरण दोनों होते हैं। बाह्य स्वरूप में वह उसकी कमेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों और अन्तःकरण में मन, बुद्धि आदि का अध्ययन करता है। उनकी दृष्टि में शिक्षा- शिक्षा मनुष्य के अंतःकरण एवं बाह्य इन्द्रियों का प्रशिक्षण है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का विचार केन्द्र मनुष्य का शरीर, मस्तिष्क एवं व्यवहार होता है। मनुष्य के अंतःकरण के मूल तत्व मन, बुद्धि और अहंकार की खोज नहीं कर सकते हैं। वे मनुष्य को एक मनोशारीरिक प्राणी मानते हैं जिसके पास जन्म से ही कुछ शक्तियां होती हैं और वह इन शक्तियों का ही विकास करता है। इन शक्तियों का विकास बहुत आवश्यक होता है।

पेस्टालॉजी ने इस विषय पर विचार किया कि इन जन्मजात शक्तियों का विकास किस दिशा में और कितना किया जाये और कहा कि यह विकास स्वाभाविक सम और प्रगतिशील होना चाहिए उन्होंने कहा, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक समरस और प्रगतिशील विकास है।”

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