ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त (Bronfenbrenner’s Ecological Theory)

सामाजिक संवेगात्मक विकास के समकालीन सिद्धान्त (Contemporary Theories of Socio-Emotional Development)-जब बालकों के सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास संयुक्त रूप से साथ-साथ होते हैं तो वह प्रक्रिया सामाजिक-सांवेगिक विकास की प्रक्रिया कहलाती है। सामाजिक-सांवेगिक विकास के सिद्धान्तों में उन, कारकों की व्याख्या करने के प्रयास किये जाते हैं जो बालक के सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास की प्रक्रिया में योगदान देते हैं। सामाजिक संवेगात्मक विकास के समकालीन सिद्धान्त हैं-    1. ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त,                2. इरिक्सन का मनोसामाजिक विकास का सिद्धान्त

ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त (Bronfenbrenner’s Ecological Theory)

यूरी ब्रोनफेनब्रेन्नर (Uri Bronfenbrenner) ने बालक के विकास की व्याख्या उसके सामाजिक परिवेश के संदर्भ (Social context) में की है। उन्होंने अपने सामाजिक विकास के सिद्धान्त में सामाजिक पर्यावरण तथा बालक की जैविक प्रवृत्तियों (Biological dispositions) के बीच में होने वाली अन्तःक्रियाओं को अधिक महत्त्व दिया है, अत: इस सिद्धान्त को पारिस्थितिकीय सिद्धान्त (Ecological Theory) के नाम से जाना जाता है। ब्रोनफेनब्रेन्नर के अनुसार बच्चे विभिन्न सामाजिक तन्त्रों (Social Systems) के बीच में रहकर बड़े होते हैं जिस कारण उनका सामाजिक विकास इन सामाजिक तन्त्रों के साथ उनकी होने वाली अन्तःक्रियाओं द्वारा प्रभावित होता है। क्योंकि इस सिद्धान्त में बालक की जैविक प्रवृत्तियों तथा उसके पर्यावरण दोनों को उसके सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है, इसी अवधारणा के आधार पर ब्रोनफेनब्रेन्नर तथा इवान्स (Evans) ने सन् 2000 में इस सिद्धान्त को जैव पारिस्थितिकीय मॉडल (Bio-ecological Model) का नाम दिया। ब्रोनफेनब्रेन्नर ने सामाजिक पर्यावरण को पाँच स्तरों/मण्डलों में विभक्त किया है। प्रत्येक मण्डल में अनेक सामाजिक अभिकरण (Social Agencies) रहती हैं, जिनके सम्पर्क में बालक का विकास होता है। बालक तथा विभिन्न सामाजिक अभिकरणों के बीच होने वाली अन्त:क्रियाए तथा इन सामाजिक अभिकरणों के बीच होने वाली पारस्परिक अन्त:क्रियाएँ बालक के विकास को प्रभावित करती हैं। ब्रोनफेनब्रेन्नर ने जिन पाँच पर्यावरणीय मण्डलों का उल्लेख किया है, वे निम्नांकित हैं—

1.लघुमण्डल, 2. मध्यमण्डल, 3. बाह्यमण्डल, 4. वृहत् मण्डल, 5. घटनामण्डल

ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त Bronfenbrenner's Ecological Theory
ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त Bronfenbrenner’s Ecological Theory

लघु मण्डल (Microsystem)

यह सामाजिक वातावरण का वह छोटा-सा परिवेश है जो बालक के सबसे निकट होता है और जिसके साथ वह सीधी अनुक्रिया करता है। इसको ब्रोनफेनब्रेन्नर ने निकटतम वातावरण (Immediate Environment) की संज्ञा दी है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, लघु मण्डल में बालक के मित्र, परिवार, स्कूल, धार्मिक संस्थाए, पास-पड़ोस, संगी-साथी, स्वास्थ्य सेवाएँ आदि को सम्मिलित किया जाता है। इस स्तर पर बालक अपने माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों, शिक्षक आदि के साथ अन्त: क्रिया (Interaction) करता है। इस अन्त:क्रिया में बालक अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से प्रभावित होता है तथा साथ-साथ अपनी प्रतिक्रियाओं से उनको भी प्रभावित करता है। अत: इस अन्त:क्रिया की प्रकृति द्विदिशात्मक (Bidirectional) होती है। जैसे कोई बच्चा शान्त अवस्था में रहता है, माता-पिता शिक्षकों तथा बड़ों का कहना मानता है तो वे भी उससे प्यार करते हैं तथा उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं। अत: उनकी अन्त:क्रिया में आत्मीयता (Cordiality) का भाव रहता है और यदि बच्चा शैतान है, दंगा करता है तथा कहना नहीं मानता है तो उसके सम्पर्क में आने वाले लोग उसे डाँटते हैं तथा उसके व्यवहार से क्षुब्ध हो हैं।

ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त
ब्रोनफेनब्रेन्नर का पारिस्थितिकीय सिद्धान्त

इस प्रकार की पारस्परिक अन्तः क्रिया की प्रकृति द्वन्द्वात्मक (Dialictic) स्थिति में पहुच कर दोनों पक्षों में चिड़चिड़ापन उत्पन्न कर देती है। अत: इस प्रकार की अन्तःक्रियाएँ बालकों के सामाजिक-सांवेगिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं।

मध्यतन्त्र/ मण्डल (Mesosystem)

मध्यमण्डल में लघुमंडल के विभिन्न घटकों के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है। यह अन्त:क्रिया एक साथ लघुमंडल की दो या दो से अधिक घटकों के साथ हो सकती है, जैसे छात्र के घर के वातावरण तथा स्कूल के वातावरण के बीच अथवा स्कूलतन्त्र (School system) तथा गृहतन्त्र के बीच। संगी-साथियों के साथ अनुभूतियों तथा पारिवारिक अनुभूतियों के मध्य होने वाले सम्बन्ध मध्य मंडल की परिसीमा में आते हैं। इपस्टीन (Epstein) ने अपने शोध अध्ययन में पाया कि जिन छात्रों को घर, स्कूल तथा संगी-साथियों में अन्त:क्रिया करने के तथा निर्णय लेने के पर्याप्त अवसर दिये गये उनमें पहल करने की क्षमता (Initiative-power) तथा उच्च स्तरीय उपलब्धि (High level achievement) प्राप्त करने की प्रवृत्ति (Tendency) अधिक पाई गयी। यदि घर के वातावरण, स्कूल के वातावरण तथा संगी-साथियों के वातावरण में समरूपता नहीं होती है तो बालक को अपने आपको इन परिस्थितियों में समायोजित करना कठिन हो जाता है तथा उसका सामाजिक एवं सांवेगिक विकास उचित एवं वांछनीय दिशा में न होकर अनेक प्रकार के विकारों से युक्त होता है।

बाह्य मण्डल (Exosystem)

बाह्य मण्डल के अन्तर्गत वह सामाजिक संदर्भ आता है जिसमें कुछ ऐसे औपचारिक संगठन होते हैं जिनसे बालक प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा नहीं होता है। लेकिन इनका बालक के सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास पर काफी कुछ प्रभाव पड़ता है। इन संगठनों में आर्थिक व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ, राजतन्त्र, जन संचार के माध्यम, धार्मिक संगठन तथा माता-पिता के कार्य स्थल (Working-place) आदि मुख्य हैं। उदाहरण के लिए-एक बालक का पिता ऐसी जगह कार्य करने जाता है जहा वह बॉस के साथ ताल-मेल न कर पाने से परेशान रहता है। वह प्राय: कार्यालय से खिन्न होकर लौटता है तथा बॉस का गुस्सा बच्चों तथा पत्नी पर उतारता है। इस तरह से घर का वातावरण दूषित हो जाता है जिससे बच्चों के संवेगों पर बुरा असर पड़ता है और कई क्षेत्रों में वे अवांछनीय व्यवहार करने लगते हैं। इसके अतिरिक्त यदि बच्चों को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ तथा अच्छी शिक्षा व्यवस्था (Education System) नहीं मिल पाती है तो वे शारीरिक, सामाजिक तथा शैक्षिक क्षेत्र में अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं जिससे उनमें हीन भावना (Inferiority Complex) आ जाती है जो उनके संवेगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

वृहत् मण्डल (Macrosystem)

इस विकास मॉडल का यह सबसे ऊपरी तथा वृहत् स्तर है। यह वह सांस्कृतिक संदर्भ (Cultural Setting) है जिससे बालक पर सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक रीति रिवाजों, मत-मतान्तरों, प्राचीन गाथाओं (History) आदि का प्रभाव पड़ता है। ये सभी बालक के सामाजिक तथा सांवेगिक विकास को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक समाज को अपने नागरिकों से कुछ आशाएँ (Expectations) होती हैं। अतः व्यक्ति जिन मूल्यों, प्रथाओं, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के परिवेश में रहकर विकसित होता है उनका प्रभाव उसके आचार-विचार, मूल्यों तथा संवेगों पर निश्चित रूप से पड़ता है। असभ्य समाज, निम्न आर्थिक स्तर तथा अशिक्षित परिवारों वाले बच्चों का सामाजिक-सांवेगिक विकास उतना अच्छा नहीं होता है जितना कि उच्च वर्ग के साधन सम्पन्न लोगों के बच्चों का हो जाता है।

घटना मण्डल (Chronosystem)

घटनामंडल में वे सब घटनाएँ सम्मिलित रहती हैं जो किसी छात्र के जीवन काल अथवा उसके जन्म से पूर्व उसके परिवार तथा परिवेश में घटित होती हैं; जैसे-माता-पिता का विवाद-विच्छेद (Divorce) हो जाना, माता-पिता में से किसी एक अथवा दोनों की मृत्यु हो जाना या फिर किसी दैवी-आपदा के कारण परिवार का अस्त-व्यस्त हो जाना आदि। इसके अतिरिक्त कुछ छात्र ऐसे हैं जो महानगरों में रहकर अति आधुनिक संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं तथा परम्परागत जातीय बन्धनों को तोड़कर अन्तर्जातीय विवाह करने में संकोच नहीं करते हैं जबकि दूसरी ओर ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले छात्र आधुनिक चीजों से अवगत तक नहीं हो पाते हैं तथा समाज और जाति द्वारा निर्धारित परम्परागत रूढ़ियों के आवरण से बाहर नहीं निकल पाते हैं। अत: अलग-अलग परिस्थितियों में रहने वाले बालकों की अलग-अलग अनुभूतियाँ (Experiences) होती हैं जिस कारण उनके मूल्यों (Values), अभिवृत्तियों (Attitudes) तथा संवेगों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि ब्रोनफेनब्रेन्नर ने सामाजिक-सांवेगिक विकास में बालकों के सामाजिक संदर्भ (Social Context) के सूक्ष्म स्तर से लेकर वृहत् स्तर तक सभी स्तरों को क्रमबद्ध रूप से सम्मिलित किया है। अतः यह सिद्धान्त बालकों के सामाजिक-सांवेगिक विकास के पहलुओं की व्याख्या करने में लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है।

ब्रोनफेनब्रेन्नर के सिद्धान्त की आलोचना

  1. इस सिद्धान्त में बालक के विकास में पर्यावरणीय कारक (घर, समाज, संस्कृति, धर्म, कार्यस्थल इतिहास आदि) को तो उचित स्थान दिया है लेकिन संज्ञानात्मक कारकों की उपेक्षा की गयी है जिस कारण अनेक मनोवैज्ञानिक इस आधार पर इस मॉडल की आलोचना करते हैं।
  2. इस मॉडल में बालकों के विकास में होने वाले परिवर्तनों का अवस्था क्रम अथवा सोपान-क्रम (Stage by stage or step by step) में उल्लेख करने का प्रयास नहीं किया गया।
  3. विभिन्न सामाजिक तन्त्रों के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं की व्याख्या करना एक जटिल कार्य है।

शैक्षिक उपयोग (Educational Implications)

  1. ब्रोनफेनब्रेन्नर ने बच्चे के विकास में स्कूल, परिवार, समाज, संस्कृति आदि अनेक पहलुओं को महत्त्व दिया है। अतः बालक के व्यवहार से सम्बन्धित जानकारी को ठीक से प्राप्त करने के लिए शिक्षक को चाहिये कि वह इन सबसे समय-समय पर सम्पर्क करता रहे।
  2. विभिन्न सामाजिक तन्त्रों तथा अभिकरणों का बालक के शैक्षिक क्रिया-कलापों में योगदान रहता है। अत: सब तन्त्रों में इस प्रकार से अन्तःक्रियाएँ होनी चाहिये ताकि बालकों को इनके साथ समायोजन करने में सुविधा हो सके।
  3. शिक्षक को बालक के परिवार, संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक स्तर, धार्मिक मूल्यों, रीति-रिवाजों आदि की पूर्ण जानकारी होनी चाहिये क्योंकि बालक के चहुँमुखी विकास (Allround development) में इन सबका विशेष योगदान रहता है।

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