रूसो का शिक्षा दर्शन

रूसो का जन्म स्विट्जरलैण्ड के जैनेवा नगर में 1712 ई. में हुआ था। रूसो एक क्रांतिकारी विचारक थे। रूसो सत्संकल्प (Good will) को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। उन्होंने आदर्श राज्य की पूरी रूपरेखा प्रस्तुत की तथा मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए पूरी शिक्षा योजना निर्मित की।

रूसो का शैक्षिक चिंतन

रूसो के शैक्षिक चिंतन में हमें निम्नलिखित आधारभूत विचारों का दिग्दर्शन होता है-

1. प्रकृति अपने मौलिक रूप में शुद्ध, सरल, सुन्दर और सुख देने वाली है।

2. मनुष्य की प्रकृति भी स्वतंत्र, शुद्ध, सरल, सुन्दर और सुखदायी है। यद्यपि वह स्वतंत्र रहना चाहता है किन्तु उसमें एक-दूसरे से प्रेम, सहयोग करने और एक-दूसरे को सुख पहुँचाने की जन्मजात प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है।

3. समाज में अनेक प्रकार के दोष विद्यमान है तथा प्रकृति पूर्ण रूप से शुद्ध है।

4. सभ्यता के ही मनुष्य का व्यवहार कृत्रिम हो गया है। वह प्रेम के स्थान पर द्वेष करने लगा है तथा दूसरों को सुख पहुँचाने के स्थान पर उनका शोषण करने में लग गया है।

5. वास्तविक ज्ञान हमें समाज से नहीं, वरन् प्रकृति से मिलता है।

6. मनुष्य की इन्द्रियाँ ज्ञान के द्वार स्वरूप हैं।

7. ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा कही जा सकती है।

रूसो के मतानुसार शिक्षा का अभिप्राय

रूसो के काल में शिक्षा चर्च के हाथों में थी तथा राज्य पर भी चर्च का प्रभाव था। इस कारण व्यक्ति का महत्त्व गौण हो गया था। शिक्षा में बालकों की व्यष्टिगत विशेषताओं का कोई महत्त्व नहीं था। उन्हें समान योग्यताओं वाला एक छोटा प्रौढ़ समझा जाता था और उन्हें शीघ्रातिशीघ्र चर्च और राज्य की मान्यताओं से परिचित कराकर राज्यभक्त बनाने का प्रयास किया जाता था। वर्गभेद चरमसीमा पर था। निर्धन बालकों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं थी जनशिक्षा की अवहेलना हो रही थी। रूसो ने राज्य में व्याप्त इस स्थिति का विरोध किया।

रूसो की मान्यता थी कि शिक्षा एक प्राकृतिक क्रिया है जिसके माध्यम से बालकों की जन्मजात शक्तियों का प्राकृतिक विकास होता है। इसलिए सभी बालकों को प्राकृतिक विकास का अवसर सुलभ कराया जाना चाहिए। रूसो ने अपने समय में प्रचलित शिक्षा को कृत्रिम बताते हुए कहा कि इस शिक्षा से बालकों की प्राकृतिक शक्तियों का विकास संभव नहीं हो पाता। रूसों ने ज्ञान देने के स्थान पर ज्ञान का विकास करने पर बल दिया। उसका कहना था कि बालकों को सत्य से परिचित कराने के स्थान पर उन्हें सत्य की खोज करने के योग्य बनाया जाना चाहिए। उसने सूचनाओं के स्थान पर अनुभव पर बल दिया। रूसो ने दो प्रकार की शिक्षा बताई-

1. सकारात्मक शिक्षा

2. नकारात्मक शिक्षा

रूसो के अनुसार सकारात्मक शिक्षा वह है जो मनुष्य के विकास से पहले उसके मस्तिष्क का विकास करके बालकों को प्रौढ़ों के कर्त्तव्यों से परिचित कराती है। नकारात्मक शिक्षा ज्ञान के साधन अवयवों को पहले मजबूत करती है। नकारात्मक शिक्षा सद्गुण प्रदान नहीं करती वरन् बुराई से बचाती है, सत्य प्रदान नहीं करती अपितु भूल से बचाती है।

रूसो ने शिक्षा के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए कहा है कि- “शिक्षा अन्दर से होने वाला विकास है, बाहर से एक साथ होनेवाली वृद्धि नहीं, यह प्राकृतिक मूल प्रवृत्तियों के क्रियाशील होने से विकसित होती है, बाह्य शक्तियों की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप नहीं।”

education philosophy of Rousseau
education philosophy of Rousseau

शिक्षा के उद्देश्य

रूसो ने समाज के स्थान पर व्यक्ति को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। इसी कारण उसने शिक्षा द्वारा व्यक्ति के वैयक्तिक विकास पर बल दिया है। रूसो का कहना था कि किसी भी बालक को सैनिक, पादरी अथवा मजिस्ट्रेट बनाने के पहले उसे इंसान बनाना चाहिए। यह इंसान प्राकृतिक और भावप्रधान होगा जो सबसे प्रेम और सहयोग करेगा। वह झूठ, अभिमान और स्वार्थपरता के दोषों से मुक्त होगा। इसी कारण रूसो ने मनुष्य की नैसर्गिक शक्तियों के प्राकृतिक विकास की बात कही है।

रूसो के अनुसार मनुष्य के विकास का एक क्रम है। वह शिशु, बालक, किशोर एवं युवावस्था को पार करता हुआ प्रौढ़ बनता है और भिन्न-भिन्न आयु स्तर पर उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति भी भिन्न होती है। अतः भिन्न-भिन्न आयु स्तर की शिक्षा के उद्देश्यों में भी कुछ भिन्नता होना स्वाभाविक है। रूसों के मतानुसार शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नांकित रूप में वर्णित किया जा सकता है-

1. शारीरिक विकास- रूसो की मान्यता थी कि शारीरिक दुर्बलता पाप की जननी है। बालकों को प्रारम्भ से ही बलशाली बनाने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य बालकों का शारीरिक विकास होना चाहिए। आयु के विभिन्न स्तरों पर भी इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए

2. इन्द्रिय प्रशिक्षण- रूसो ने इन्द्रियों को ज्ञान का द्वार माना है। इसी कारण उसने पुस्तकीय ज्ञान का विरोध करते हुए इन्द्रिय प्रशिक्षण एवं स्वयं के अनुभव से सीखने पर बल दिया है। रूसो का कहना है कि बाल्यावस्था में बालक की प्रकृति अपने शारीरिक और इन्द्रिय विकास होती है, अतः इस स्तर पर बालकों की इन्द्रियों को मजबूत करने पर सर्वाधिक ध्यान देना चाहिए।

3. बौद्धिक विकास- रूसो की मान्यता है कि जब बालक की इन्द्रियाँ प्रशिक्षित हो जाएगी तब वह स्वयं के अनुभव द्वारा सत्ता की खोज करेगा और इस प्रकार उसका बौद्धिक विकास होगा। रूसो इसे शिक्षा का एक उद्देश्य मानते हैं। रूसो का कहना है कि किशोरावस्था में बालकों को ऐसा पर्यावरण उपलब्ध कराना चाहिए जिससे वे परिश्रम करना सीखें, अध्यवसाय करें, अन्वेषण में रुचि लें तथा स्वयं के अनुभव से विकास करें।

4. भावात्मक विकास – रूसो के अनुसार मनुष्य का शरीर, ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि, इन तीन स्तरों पर पहले विकास करना चाहिए। तत्पश्चात् युवावस्था में उनके हृदय का विकास करना चाहिए। उनमें मानवमात्र के प्रति प्रेम, सहानुभूति और सहयोग का भाव उत्पन्न करना चाहिए।

5. जीने की कला – रूसो चाहता था कि मनुष्य जीने की कला में भी दक्ष हो। रूसो का कहना था कि स्त्रियों और पुरुषों के कार्यक्षेत्र भिन्न है, इसलिए उन्हें अपने-अपने कार्यक्षेत्र का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। वह पुरुषों को व्यवसाय की शिक्षा तथा स्त्रियों को गृहकार्य की शिक्षा देने के पक्ष में था।

6. अधिकारों की रक्षा- रूसो के समय में चर्च और राज्य द्वारा सामान्य जनता का अत्यधिक शोषण हो रहा था। इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावात्मक विकास के साथ-साथ जीवन जीने की कला और अन्याय का विरोध करने की शक्ति के विकास पर भी बल दिया। रूसो की मान्यता थी कि मनुष्य का जीवन सुखी रह सके, इस हेतु अधिकारों की रक्षा करना भी आवश्यक है।

7. स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण- रूसो के समय में व्यक्ति समाज, धर्म और राज्य तीनों के शिकंजे में दबा हुआ था। रूसो की मान्यता थी कि मनुष्य जन्म से स्वतंत्र पैदा हुआ है, उसकी प्रकृति स्वतंत्र रहने की है इसलिए उसे स्वयं समाज और राज्य का निर्माण करने एवं उसका संचालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यह तभी संभव है जब व्यक्तियों को सोचने और विचार अभिव्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो। इसी से स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण भी संभव हो सकेगा।

शिक्षा की पाठ्यचर्या

रूसो ने मनुष्य के शैक्षिक जीवन को चार भागों में विभाजित कर उनके लिए पृथक्-पृथक् पाठ्यचर्या निर्धारित की है-

शैशवकाल : जन्म से 5 वर्ष तक इस आयु के बालकों को प्रकृति की गोद में स्वतंत्र विचरण करने देने, उनके खेलने-कूदने, दौड़ने, गाने आदि का अवसर देना उनकी पाठ्यचर्या निर्धारित की गई।

बाल्यावस्था : 5 से 12 वर्ष तक – इस आयु वर्ग के बालकों के लिए शारीरिक विकास को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें खेलने-कूदने, दौड़ने, तैरने का पूर्ण अवसर प्रदान करना तथा इन्द्रियों के विकास का लक्ष्य निर्धारित किया। साथ ही प्रकृति अध्ययन, भाषा, गणित और भूगोल की शिक्षा दी जानी चाहिए। इस समय वे स्वयं के अनुभवों के आधार पर सीखेंगे ।

किशोरावस्था : 12 से 15 वर्ष तक इस आयु वर्ग के बालकों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति तीव्र हो जाती है। वे नई-नई खोज में रुचि रखते हैं, अतः इस समय उन्हें प्राकृतिक विज्ञानों की शिक्षा दी जानी चाहिए। साथ ही भाषा, गणित, भूगोल, हस्तकार्य, संगीत, सामाजिक विज्ञान एवं उद्योग की शिक्षा दी जानी चाहिए।

युवावस्था : 15 से 25 वर्ष तक – रूसो इस आयु वर्ग के युवाओं के लिए निश्चयात्मक शिक्षा प्रारम्भ करने के पक्ष में थे। इस आयु में नीति, धर्म, प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, दया, क्षमा, सहनशीलता आदि गुणों का विकास होना चाहिए। इतिहास की शिक्षा भी इस आयु वर्ग के युवाओं को दी जानी चाहिए। पूर्व स्तरों की शारीरिक और बौद्धिक शिक्षा का क्रम भी इस आयु वर्ग के युवाओं के लिए जारी रहेगा। उनकी व्यावसायिक शिक्षा भी पूर्ण होगी।

स्त्रियों के लिए पाठ्यचर्या – रूसो स्त्रियों को गृहस्थ जीवन की शिक्षा और सद्व्यवहार की शिक्षा देने के पक्षधर थे।

रूसो की शिक्षण विधियाँ

रूसो ने शिक्षा के क्षेत्र में कृत्रिमता को दूर करने का प्रयास किया। रूसो की मान्यता थी कि बालकों को समाज के कृत्रिम एवं दोषपूर्ण पर्यावरण से दूर प्रकृति की गोद में रखकर उनकी शिक्षा का विधान किया जाना चाहिए। रूसो ने कहा था- प्रकृति की ओर लौटो। रूसो का कहना था कि बालक, बालक ही होता है, प्रौढ़ नहीं। अतः उसकी शक्ति, रुचि एवं रूझान प्रौढ़ों से भिन्न होता है। इसलिए उस पर आदर्शों का बोझ नहीं डालना चाहिए। उसे स्वतंत्र रूप से करके सीखने देना चाहिए। ‘करके सीखना तथा स्वयं के अनुभव से सीखना’ इस पर रूसो ने बल दिया। साथ ही उसने ज्ञानेन्द्रियों द्वारा शिक्षा पर बल दिया।

रूसो चाहता था कि बालकों को सीखने में पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए। बच्चों को उनकी रुचि, रुझान और योग्यता के अनुसार सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए। रूसो की मान्यता थी कि बालकों को पूर्ण स्वतंत्रता देकर उनके स्वाभाविक विकास में सहयोग किया जाना चाहिए ।

ज्ञातव्य है कि रूसो के विचारों के प्रभाव से शिक्षा के क्षेत्र में इन्द्रिय अनुभव, क्रिया और स्वयं निर्णय निकालने पर बल दिया जाने लगा तथा शिक्षा के क्षेत्र में अनेक नवीन मनोवैज्ञानिक विधियों – अवलोकन विधि, प्रयोग विधि, अन्वेषण विधि, डाल्टन प्रणाली आदि का प्रादुर्भाव हुआ ।

रूसो के शिक्षा दर्शन के संदर्भ में अन्य महत्त्वपूर्ण विचार

1. बालकों को समाज से दूर स्वच्छ, प्राकृतिक वातावरण में रखना चाहिए जिससे वह स्वयं अनुशासित हो जाएगा। उसे बाहर से न कुछ बताने की आवश्यकता है और न ही उसकी भूलों के लिए उसे दंडित करने की आवश्यकता है। अनुशासन के सम्बन्ध में रूसो ने स्वतंत्रता के सिद्धान्त तथा प्राकृतिक परिणाम के सिद्धान्त का समर्थन किया है।

2. रूसो ने शिक्षक का कार्य बालकों के प्राकृतिक विकास में सहायता करना बताया। शिक्षक बालकों को अनुदेशन नहीं देगा वरन् बालकों के विकास के लिए पर्यावरण तैयार करेगा। शिक्षक उनका नियंत्रक नहीं सहायक होगा।

3. रूसो ने शिक्षा के क्षेत्र में सर्वाधिक महत्त्व विद्यार्थी को दिया है। उसने बालकों के नैसर्गिक विकास की प्रवृत्तियों के स्वाभाविक विकास को ही शिक्षा की संज्ञा दी। उसने बालकों को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता देने का समर्थन किया। रूसो ने इन्हें सामाजिक नियम एवं नैतिक आचरण के बंधनों से भी मुक्त रखने का समर्थन किया है। रूसो ने विद्यार्थी को शिक्षा का केन्द्र बना दिया तथा उसकी पूरी शिक्षा का विधान उसकी जन्मजात शक्तियों, रुचियों एवं आवश्यकताओं के अनुकूल किया।

4. रूसो विद्यालयों को समाज से दूर प्रकृति की सुरम्य गोद में स्थापित करने के पक्षधर थे।

5. रूसो की मान्यता थी कि शिक्षा पर न तो चर्च का अधिकार हो और न ही राज्य का। रूसो ने शिक्षा को किसी भी सामाजिक बंधन से मुक्त रखने का विचार प्रस्तुत किया।

6. रूसो ने जनशिक्षा का समर्थन किया। वह स्त्री और पुरुषों के कार्यक्षेत्रों की भिन्नता को दृष्टिगत रखते हुए दोनों की शिक्षा में अन्तर रखना चाहता था। वह स्त्रियों को गृहकार्य की शिक्षा देने के पक्ष में था।

7. रूसो ने जीविकोपार्जन के लिए पुरुषों की व्यावसायिक शिक्षा पर बल दिया।

8. धार्मिक और नैतिक शिक्षा के क्षेत्र में रूसो ने मानव मात्र के प्रति प्रेम की शिक्षा, सेवा की शिक्षा, सत्संकल्प की शिक्षा पर बल दिया है।

2 thoughts on “रूसो का शिक्षा दर्शन”

  1. रूसो के शिक्षा पर जो दार्शनिक विचार है बहुत ही प्रासंगिक है लेकिन जो उन्होंने स्त्री शिक्षा पर विचार व्यक्त किए हैं वो वर्तमान की परिस्थितियों के अनुसार प्रासंगिक नहीं है इसलिए मैं रूसो की स्त्रियों की शिक्षा पर विचार का खंडन करता हूँ

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    • Dear friend
      Agreed by your point. It’s the Time which matters the most. Remember, it was his time, when he felt it would work the best.
      Regards
      CSK

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