भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास

इस लेख में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास का अध्ययन करेंगे। जैसा कि हम जानते हैं भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास अत्यन्त उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। भारतीय समाज में शिक्षा को सदैव ही अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। समय-समय पर शिक्षा के क्षेत्र में नवीन एवं सार्थक प्रयास किये जाते रहे हैं। भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास का विवरण निम्नलिखित है-

वैदिक कालीन शिक्षा

प्राचीन भारतीय शिक्षा का उदय वेदों से माना जाता है। वेद विश्व साहित्य के प्राचीनतम तथा दुर्लभतम ग्रन्थ स्वीकार किये जाते हैं। वेद का अर्थ है – ज्ञान से होता है। वेद चार हैं; ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद

शिक्षा के उद्देश्य – वैदिक काल में शिक्षा के मुख्य उद्देश्य संस्कारों का विकास करना, आत्मा की पवित्रता का विकास करना, व्यक्तित्व का विकास करना, सामाजिकता व नागरिकता का ज्ञान प्रदान करना, संस्कृति का संरक्षण व प्रसार करना तथा जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना था।

उपनयन संस्कार – शिक्षा का प्रारम्भ उपनयन संस्कार से होता था। उपनयन संस्कार के समय बालक की आयु सामान्यतः आठ वर्ष से बारह वर्ष के बीच रहती थी। उपनयन न कराने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता था। इस प्रकार से शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य था।

शिक्षा संस्थायें – यद्यपि प्रारम्भिक शिक्षा घर पर दी जाती थी, तथापि औपचारिक शिक्षा आश्रम अथवा गुरुकुलों में दी जाती थी। गुरुकुल गुरुओं के द्वारा व्यक्तिगत रूप से चलाये जाने वाले पारिवारिक विद्यालय होते थे। छात्र गुरुकुल में ही रहते थे तथा ब्रह्मचारी कहलाते थे।

छात्रगण – सदाचार तथा योग्यता के आधार पर छात्रों को गुरुकुल में प्रवेश मिलता था। छात्र ज्ञान प्राप्त करने के इच्छुक तथा उत्साही होते थे।

वेशभूषा – अध्ययन के दौरान ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य वर्णों के बालकों के लिए भिन्न-भिन्न वेशभूषा निर्धारित रहती थी। छात्र मेखला भी पहनते थे, अपने साथ डंडा रखते थे तथा केश बढ़ाते थे।

दिनचर्या – जंगल में लकड़ी चुनना, भिक्षा लाना, गाय चराना, कृषि करना, तथा वेदों का अध्ययन करना छात्रों की दिनचर्या के आवश्यक अंग थे।

पाठ्यक्रम – वेद तथा उसकी समीक्षाओं को पाठ्यक्रम में मुख्य स्थान प्राप्त था। इसके अतिरिक्त इतिहास, ज्योतिष, गणित, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान भूगर्भ विद्या, तर्कशास्त्र का अध्ययन कराया जाता था। शिक्षा संस्कृत के माध्यम से दी जाती थी।

शिक्षण विधि – शिक्षण हेतु मौखिक, प्रश्नोत्तर, व्याख्यान, वाद-विवाद, क्रियात्मक आदि विधियों का प्रयोग किया जाता था। छात्रों को उनकी योग्यता के अनुसार ज्ञान प्रदान किया जाता था। तप तथा श्रुति ज्ञान प्राप्त करने की दो मुख्य विधियाँ थीं। सामान्य छात्रों को 12 वर्ष तक अध्ययन करना होता था।

परीक्षा प्रणाली – सतत व संचयी मूल्यांकन अध्यापक के द्वारा किया जाता था। औपचारिक परीक्षा का प्राविधान नहीं था।

गुरु-शिष्य सम्बन्ध – गुरुकुल में अध्यापक तथा छात्रों के बीच अत्यन्त मधुर व आध्यात्मिक सम्बन्ध होते थे। अध्यापक छात्रों को पितृतुल्य नेह देता था तथा छात्र गुरु सेवा को अपना परम सौभाग्य मानते थे।

नारी शिक्षा – वैदिक काल में नारी शिक्षा अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में थी। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश से पूर्व लड़कियाँ अध्ययन करती थीं।

समावर्तन संस्कार – शिक्षा की समाप्ति पर गुरु समावर्तन संस्कार के रूप में छात्रों को उपदेश देते थे जिसमें सत्य बोलने, कर्तव्य पालन तथा वेदाध्ययन को विस्मृत न करने पर विशेष बल दिया जाता था।

दंड व्यवस्था – शारीरिक दंड निषेध था। आवश्यकता पड़ने पर छात्रों की शुद्धि के लिये उद्दालक व्रत का पालन करना दंड के रूप में दिया जाता था।

वित्त व्यवस्था – शिष्यों द्वारा लाई भिक्षा, शिष्यों द्वारा दी गई गुरुदक्षिणा, दान, उपहार, पशुपालन व कृषि से हुई आय, राजकीय सहायता आदि से वैदिक युग में शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी।

कमियाँ – धर्म को अत्यधिक महत्व, स्त्री, शूद्रों व जनसामान्य की शिक्षा की उपेक्षा, लोक-भाषाओं को कम महत्व, विचार स्वातन्त्र्य का अभाव, सांसारिक जीवन की उपेक्षा, शारीरिक श्रम के प्रति हेय दृष्टि तथा नवीन धर्मो का अनादर करना आदि वैदिक कालीन शिक्षा के प्रमुख दोष थे।

उपादेयता – वैदिक शिक्षा की अनेक विशेषताएं जैसे आदर्शवादिता, अनुशासन, गुरु-शिष्य सम्बन्ध, शान्त परिवेश, शिक्षण विधि, सरल जीवन आदि वर्तमान समय में भी प्रासंगिक तथा उपादेय हैं।

बौद्धकालीन शिक्षा

बौद्धकालीन शिक्षा का उदय बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार के लिये हुआ था। बौद्ध धर्म वास्तव में विशाल हिन्दू धर्म का ही एक परिवर्तित रूप था। हिन्दू धर्म में संस्कारों तथा ज्ञान पर अधिक बल था जबकि बौद्ध धर्म में निजी आचरण पर अधिक बल था।

शिक्षा के उद्देश्य – बौद्धकालीन शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य नैतिक चरित्र का विकास करना, बौद्ध धर्म का प्रचार व प्रसार करना, व्यक्तित्व का विकास करना तथा जीवन के लिये तैयार करना था।

प्रव्रज्या संस्कार – शिक्षा का प्रारम्भ प्रव्रज्या संस्कार से होता था। प्रायः आठ वर्ष की आयु में बालक मठ में जाकर प्रव्रज्या ग्रहण करता था तथा इसके उपरान्त वह बौद्ध मठ में ही रहता था। तब बालक को ‘सामनेर’ कहते थे।
छात्रों की दिनचर्या-बौद्धमठों में छात्रों को दस शिक्षा पद अर्थात् (1) अहिंसा, (2) श्रेष्ठ आचरण, (3) सत्य व्रत, (4) सत-आहार, (5) अमादकता, (6) अनिन्दा, (7) सरल जीवन, (8) नृत्य न देखना, (9) अपरिग्रह तथा (10) बहुमूल्य पदार्थों का दान न लेना, का पालन करना होता था।

शिक्षा संस्थायें– बौद्ध काल में शिक्षा का स्वरूप संस्थागत हो गया था। बौद्ध मठों में छात्रों को शिक्षा दी जाती थी। बौद्ध मठों का वातावरण सामाजिक होता था। बौद्ध मठ अत्यंत विशाल, सुन्दर, व सुविधा युक्त होते थे। नालन्दा व तक्षशिला बौद्ध काल की सर्वाधिक उल्लेखनीय शिक्षा संस्थाएँ थीं।

पाठ्यक्रम– बौद्ध कालीन शिक्षा में बौद्ध धर्म को पाठ्यक्रम में मुख्य स्थान प्राप्त था। इसके अतिरिक्त दर्शन, चिकित्सा, शिल्प कला, सैनिक शिक्षा, गणित, भाषा आदि का अध्ययन कराया जाता था।

शिक्षण विधि – वेदकालीन शिक्षा के समान बौद्ध काल में मौखिक शिक्षण कार्य होता था। प्रश्नोत्तर, विचार-विमर्श, वादविवाद, देशाटन आदि के द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती थी। शिक्षण कार्य पाली या प्राकृत भाषा में होता था।

छात्र-अध्यापक सम्बन्ध – छात्र-अध्यापक सम्बन्ध मधुर तथा स्नेहपूर्ण होते थे। अध्यापक पुत्रवत छात्र का ध्यान रखता था। छात्र अध्यापकों के प्रति उच्च स्तरीय श्रद्धा व भक्ति का भाव रखते थे।

अनुशासन व दण्ड व्यवस्था – बौद्ध मठ के नियमों व अनुशासन का पालन करना सभी सामनेरों के लिए अनिवार्य होता था। मठ के नियमों का उल्लंघन करने पर छात्रों को बौद्ध मठ से निष्कासित कर दिया जाता था। अनैतिक आचरणों पर प्रतिबन्ध लगाने के उद्देश्य से विद्वत् सभा के समक्ष अपनी त्रुटियों को स्वीकार करके आत्म-निरीक्षण एवं स्वदोष अनुभूति के स्व अनुशासन की व्यवस्था रहती थी।

नारी शिक्षा – बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव के प्रारम्भिक वर्षों में स्त्रियों को बौद्ध मठों में प्रवेश नहीं दिया जाता था। परन्तु बाद में महिलाओं को भिक्षुणी के रूप में प्रवेश दिया जाने लगा। भिक्षुणियाँ कठोर जीवन व्यतीत करती थीं। वे एकान्त में भिक्षुक से शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकती थीं। जनसाधारण में नारी शिक्षा का प्रचलन कम था।

उपसम्पदा संस्कार – बौद्ध मठ में बारह वर्ष की शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त जो सामनेर जीवनपर्यन्त भिक्षुक बना रहना चाहता था, उसका उपसम्पदा संस्कार किया जाता था। उपसम्पदा के इच्छुक सामनेर भिक्षुक के वेश में अन्य भिक्षुकों के समक्ष उपस्थित होकर उपसम्पदा देने की प्रार्थना करता था। संघ उसके अनुरोध पर प्रजातान्त्रिक ढंग से निर्णय करके या तो उसे पक्का भिक्षुक बना लेते थे अथवा गृहस्थ जीवन में जाने का निर्देश देते थे। परन्तु उपसम्पदा होने पर उसका गृहस्थी से कोई सम्पर्क नहीं रहता था।

वित्त व्यवस्था – राजकीय सहायता, धर्मस्व, उपहार, दान, शिक्षा तथा शुल्क की सहायता से बौद्ध मठों का खर्चा चलता था। भोजन, वस्त्र, आवास, वेतन, उपकरण, भवन तथा साहित्य सृजन बौद्ध काल की शिक्षा के व्यय की प्रमुख मदें थीं।

कमियाँ – कट्टर धार्मिक विचारों का समावेश, लौकिक जीवन की उपेक्षा, स्त्री शिक्षा उपेक्षा तथा हस्तकार्यों के प्रति घृणा बौद्धकालीन शिक्षा के कुछ प्रमुख दोष थे।

उपादेयता – बौद्धकालीन शिक्षा की अनेक विशेषतायें जैसे छात्रों व अध्यापकों का सरल व त्यागपूर्ण जीवन, शान्ति व अहिंसा का अनुसरण, जनसामान्य की शिक्षा तथा शिक्षा संस्थाओं का प्रजातान्त्रिक संगठन आदि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भी उपादेय सिद्ध हो सकती हैं।

मुस्लिम कालीन शिक्षा

मुस्लिम काल की शिक्षा मुस्लिम शासकों की देन थी। भारतवर्ष पर मुसलमानों का शासन स्थापित हो जाने पर मुसलमानों ने इस्लाम धर्म व संस्कृति के प्रचार-प्रसार में शिक्षा का सहारा लिया।

शिक्षा के उद्देश्य – मुस्लिम काल की शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य (1) इस्लाम धर्म का प्रचार करना, (ii) मुस्लिम संस्कृति का प्रसार करना, (iii) मुसलमानों में ज्ञान का प्रसार करना, (iv) मुस्लिम शासन को सुदृढ़ करना तथा (v) सांसारिक उन्नति करना था।

विस्मिल्लाह रस्म – शिक्षा का प्रारम्भ विस्मिल्लाह रस्म से होता था। मौलवी साहब बालक से कुरानशरीफ की कुछ आयतों का अथवा केवल विस्मिल्लाह का उच्चारण करवाकर तथा कुछ नजराना लेकर बालक को मकतब में शिक्षा के लिए प्रविष्ट कर लेते थे।

शिक्षा संस्थायें – प्रारम्भिक शिक्षा मकतबों तथा उच्च शिक्षा मदरसों में प्रदान की जाती थी। मकतब मस्जिद से जुड़े होते थे तथा मस्जिद के मौलवी साहब ही मकतब में पढ़ाते थे। मकतब की शिक्षा पूर्ण करके छात्र मदरसों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते थे।

पाठ्यक्रम – मकतबों में सुलेख, कुरान, नमाज, अजानस, गणित बातचीत, पत्र-व्यवहार, अर्जी नबीसी आदि सिखाया जाता था। मदरसों में छात्रों को अरबी, फारसी, तर्क शास्त्र, दर्शन, ज्योतिष, उच्च गणित, इतिहास, भूगोल, चिकित्सा तथा इस्लाम धर्म का गहन अध्ययन कराया जाता था। शिक्षा का माध्यम मुख्यतः अरबी-फारसी था। बाद में प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू में दी जाने लगी थी।

शिक्षण विधि – शिक्षण के लिए मौखिक तथा क्रियात्मक विधि का प्रचलन था। व्याख्यान, प्रश्नोत्तर, वाद-विवाद, स्वाध्याय जैसी विधियों का प्रयोग मकतब तथा मदरसों में किया जाता था।

अध्यापक-छात्र सम्बन्ध – मुस्लिम काल में अध्यापक-छात्र सम्बन्ध यद्यपि घनिष्ठ तथा मधुर होते थे परन्तु उनमें वेदकालीन या बौद्धकालीन छात्र-अध्यापक सम्बन्धों जैसी गरिमा नहीं थी।

परीक्षा प्रणाली – अध्ययन की समाप्ति पर औपचारिक परीक्षा लेने का रिवाज मुस्लिम काल तक विकसित नहीं हुआ था। अध्यापक के सन्तुष्ट हो जाने पर छात्रों की शिक्षा पूर्ण मान ली जाती थी।

अनुशासन तथा दण्ड – अनुशासन को बनाये रखने के लिए बेंत, कोड़े, लात, घूसे, मुर्गा बनाने, ऊठक बैठक लगाने, खड़ा रखने जैसे शारीरिक दण्ड भी दिये जाते थे। योग्य व कुशल छात्रों को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया जाता था।

नारी शिक्षा – यद्यपि प्रारम्भिक शिक्षा सभी महिलाओं के लिए सुलभ थी, परन्तु उच्च शिक्षा केवल शाही घरानों व अमीर परिवारों की महिलाओं को उपलब्ध हो पाती थी। इस काल में नारी शिक्षा एक तरह से उपेक्षणीय थी।

व्यावसायिक शिक्षा – मुस्लिम काल में ललितकला, हस्तकला, वास्तुकला, सैनिक शिक्षा आदि विविध प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा का पर्याप्त विकास हुआ।

छात्रावास – मदरसों के साथ छात्रावास भी होते थे जहाँ दूर-दूर से छात्र पढ़ने के लिए आते थे। ये छात्रावास सुविधा सम्पन्न होते थे।

वित्त व्यवस्था – धर्मस्व, संकोचशील राजकीय सहायता, दान, उपहार, आदि मुस्लिम कालीन शिक्षा की आय के साधन थे। अध्यापकों के वेतन, छात्रों के भोजन, भवनों का निर्माण व देख-रेख, तथा पाण्डुलिपियों के निर्माण व क्रय पर धन व्यय किया जाता था।

कमियाँ – इस्लाम धर्म की कट्टरता, लोक भाषाओं की उपेक्षा, स्त्री शिक्षा की उपेक्षा, शिक्षा भौतिकता पर बल, हिन्दुओं की शिक्षा की उपेक्षा, कठोर शारीरिक दंड, छात्रों की विलासप्रियता, व्यापकता का अभाव तथा शिक्षा में अस्थिरता आदि मुस्लिम शिक्षा के प्रमुख दोष थे।

उपादेयता – मुस्लिम काल की शिक्षा की अनेक बातें जैसे व्यावहारिक शिक्षा पर बल, अध्यापकों व छात्रों के बीच व्यक्तिगत सम्पर्क, धार्मिक व लौकिक शिक्षा का समन्वय तथा शिक्षक की सम्मानजनक स्थिति आदि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावशाली बनाने तथा वर्तमान शिक्षा समस्याओं को दूर करने के लिए सार्थक सिद्ध हो सकती है।

ब्रिटिश कालीन शिक्षा (1700 ईo से 1947 ईo तक)

ब्रिटिशकालीन शिक्षा का प्रारम्भ ईसाई मिश्नरियों के द्वारा किये गये धर्म प्रचार के प्रयासों के फलस्वरूप हुआ था। सन् 1757 में बंगाल विजय के उपरान्त धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारतवर्ष पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन स्थापित हो गया। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने व्यापारिक व राजनैतिक उद्देश्यों के लिए शिक्षा प्रसार में रुचि दिखलाई।

सीरामपुर त्रिमूर्ति

कैरे, वार्ड तथा मार्शमैन ने सीरामपुर बंगाल में ईसाई धर्म के प्रचार तथा हिन्दू व मुस्लिम धर्म की आलोचना करने वाली एक पुस्तिका का प्रकाशन तथा वितरण किया।

चार्ल्स ग्राण्ट के शैक्षिक प्रयास

चार्ल्स ग्राण्ट ने सन् 1792 में एक पंचसूत्रीय योजना प्रस्तुत की थी जिसमें भारत में विद्यालयों की स्थापना, अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा, अंग्रेजी साहित्य की शिक्षा, पाश्चात्य ज्ञान व विज्ञान का प्रसार तथा ईसाई धर्म के प्रचार की आवश्यकता पर बल दिया।

सन् 1813 का आज्ञापत्र

ब्रिटिश संसद के द्वारा पारित किए गए इस अधिनियम में भारत में शिक्षा के ऊपर कम से कम एक लाख रुपये प्रतिवर्ष व्यय करने का आदेश ईस्ट इंडिया कम्पनी को दिया गया था। जिसे सन् 1833 के आज्ञापत्र में बढ़ाकर दस लाख रु० वार्षिक कर दिया गया।

प्राच्य- पाश्चात्य विवाद

इस विवाद का जन्म ईस्ट इंडिया कंपनी के 1813 के आज्ञा पत्र से हुआ।

शिक्षा के लिए निर्धारित धन राशि संस्कृत-फारसी के माध्यम से दी जाने वाली प्राचीन सरकार की शिक्षा पर व्यय करनी चाहिए अथवा अंग्रेजी के माध्यम से पाश्चात्य प्रकार की शिक्षा पर व्यय की जानी चाहिए, इस पर मतभेद हो गया जिसके कारण शिक्षा के लिए निर्धारित धनराशि ठीक ढंग से खर्च नहीं की जा सकी।

मैकाले का विवरण पत्र – 1835

10 जून, 1834 को लार्ड मैकाले गवर्नर जनरल की काउंसिल का कानूनी सलाहकार बन कर भारत आया।

* तत्कालीन गवर्नर जनरल- लॉर्ड विलियम बैंटिक

* मैकाले ने 1835 में अपना विवरण पत्र प्रस्तुत किया।

सन् 1835 में लार्ड मैकाले ने भारत में शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रचार करना घोषित किया जिससे पाश्चात्य तथा विज्ञान में रंगे भारतीय तैयार हो सके जो अंग्रेजी शासन में सहायक हों। मैकाले ने अधोगामी निस्यन्दन सिद्धान्त की संकल्पना करते हुए कहा कि सम्भ्रान्त वर्ग को शिक्षित करने पर समाज के निम्न वर्ग तक शिक्षा स्वतः ही पहुंच जायेगी।

आकलैंड ने अपनी शिक्षा नीति 1839 में  घोषित की थी।

वुड का घोषणापत्र -1854

19 जुलाई, 1854 में सर चार्ल्स वुड ने अपना घोषणापत्र प्रस्तुत किया।

घोषणापत्र में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के पुनरीक्षण तथा भावी शैक्षिक पुनर्निर्माण के लिए नीति को प्रस्तुत किया गया जिसमें जनसाधारण के लिए शिक्षा व्यवस्था करने, छोटी कक्षाओं में प्रान्तीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने, अध्यापकों का प्रशिक्षण प्रारम्भ करने तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना करने की बात कही गई है।

भारतीय शिक्षा आयोग – 1882 (हण्टर कमीशन)

1880 में लार्ड रिपन भारत के नए गवर्नर जनरल और वायसराय नियुक्त हुए।

लॉर्ड रिपन ने 3 फरवरी, 1882 को भारतीय शिक्षा आयोग का गठन किया।

भारतीय शिक्षा आयोग में 20 सदस्य (7 भारतीय) एवं 1 सचिव थे।

भारतीय सदस्य-

  • सैयद महमूद
  • भूदेव मुखर्जी
  • आनंद मोहन बोस
  • केo टीo तैलंग
  • पीo  रंगानन्द  मुदालियर
  • महाराजा जितेंद्र मोहन टैगोर
  • हाजी गुलाम

भारतीय शिक्षा आयोग (हण्टर कमीशन) का प्रतिवेदन

भारतीय शिक्षा आयोग ने 7 सप्ताह तक कोलकाता में शिक्षा सम्बन्धी पूर्व सरकारी दस्तावेजों विशेषकर वुड डिस्पैच का गहराई से अध्ययन किया।

भारतीय शिक्षा आयोग ने 7 माह तक भारत के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का समग्र रूप से अध्ययन किया।

भारतीय शिक्षा आयोग ने 770 पृष्ठों का एक दस्तावेज (प्रतिवेदन) मार्च 1883 में सरकार को प्रेषित किया।

भारतीय शिक्षा आयोग (हण्टर कमीशन) के तहत 2 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई-

  1. पंजाब विश्वविद्यालय (1882)
  2. इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1887)

भारतीय शिक्षा आयोग (हण्टर कमीशन) ने देशी शिक्षा को प्रोत्साहन देने, प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करने तथा नारी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ शिक्षा का उत्तरदायित्व वैयक्तिक संस्थाओं को सौंपने तथा उदारतापूर्वक सहायता अनुदान देने की अनुशंसा की।

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग – 1902  (रैले कमीशन)

1899 में लॉर्ड कर्जन ब्रिटिश भारत के नए गवर्नर जनरल और वायसराय नियुक्त हुए।

लार्ड कर्जन ने 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में शिक्षा की गुणात्मक वृद्धि का नारा बुलंद किया। उसने शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण को बढ़ा दिया ।

सितंबर 1901 में शिमला में एक शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया।

इस शिक्षा सम्मेलन में भारतीय शिक्षा पर विस्तार से विचार किया।

27 जनवरी, 1902 में सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई।

भारतीय विश्वविद्यालय आयोग ने सीनेटों व सिंडिकेटों का पुनर्गठन करने, विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य प्रारम्भ करने तथा छात्रों को छात्रवृत्तियाँ देने के सुझाव दिए।

इस आयोग के सुझाव के आधार पर 21 मार्च, 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम-1904 पारित किया।

गोखले विधेयक – 1911

गोपालकृष्ण गोखले ने सन् 1910 व 11 में केन्द्रीय धारा सभा में प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बनाने के लिए प्रस्ताव रखा जो कि अस्वीकार कर दिया गया। शिक्षा नीति, सम्बन्धी सरकारी प्रस्ताव सन् 1913 में जारी सरकारी प्रस्ताव में निरक्षरता दूर करने तथा प्राथमिक शिक्षा पर अधिक धन व्यय करने की नीति को स्वीकार किया गया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग – 1917 (सैडलर कमीशन)

14 सितम्बर, 1917 में डॉ० माइकल सैडलर (कुलपति, लीड्स विश्वविद्यालय) की अध्यक्षता में कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई।

सदस्य – कुल 07 सदस्य जिनमें 02 भारतीय

कुछ मुख्य सदस्य – डॉ० ग्रेगरी ,सर फिलिप हर्टाग, सर रैमजे म्योर , सर आशुतोष मुखर्जी तथा डॉ० जियाउद्दीन अहमद

इस आयोग में स्नातक पाठ्यक्रम को तीन वर्षीय बनाने, सीनेट व सिंडीकेट के स्थान पर छोटे आकार की प्रतिनिधि सभा व कार्यकारिणी परिषद गठित करने तथा प्रत्येक प्रान्त में माध्यमिक व इंडरमीडिएट बोर्ड स्थापित करने की सिफारिशें की गई।

हर्टाग समिति – (1927-29)

ब्रिटिश सरकार ने भारत की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को समझते हुए और तद्नुकूल भारत में अपनी शासन नीति निश्चित करने के उद्देश्य से 8 नवंबर 1927 को ‘साइमन कमीशन’ की नियुक्ति की।

भारतीय शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं और मांगों का अध्ययन करने के लिए एक सहायक समिति का गठन किया गया।

अध्यक्ष के नाम पर इस समिति को “हर्टाग समिति” कहा जाता है।

इस समिति ने 11 सितंबर 1929 को अपना प्रतिवेदन साइमन कमीशन को प्रस्तुत कर किया।

एबट-वुड रिपोर्ट – 1937

सन् 1937 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में एबट तथा वुड ने सामान्य शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा के विकास के सम्बन्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण सिफारिशें की।

भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास
भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास

स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत में शिक्षा

स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत में अनेक शिक्षा आयोगों तथा समितियों का गठन किया गया। इन आयोगों तथा समितियों ने अपने-अपने क्षेत्र की शिक्षा समस्याओं पर विचार-विमर्श किया तथा अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये। शिक्षा प्रणाली से सम्बन्धित इन आयोगों के द्वारा दिए सुझावों के आधार पर स्वतन्त्र भारत में शिक्षा के विकास को महत्वपूर्ण दिशा प्रदान की गई।

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग- 1948 (राधाकृष्णन कमीशन)

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद (CABE- Central Advisory Board on Education) के सुझाव पर विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार के लिए भारत सरकार ने 4 नवम्बर,  1948 को डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की नियुक्ति की।

अध्यक्षडॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रोफेसर, पूर्वी धर्म तथा नीति शास्त्र, आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय

सदस्य– 1. डॉ० तारा चन्द्र, सचिव तथा शिक्षा सलाहकार, भारत सरकार
2. डॉ० जेम्स एफ० डफ्फ, कुलपति, दुरहाम विश्वविद्यालय
3. डॉ० जाकिर हुसैन, कुलपति, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़
4. डॉ० आर्थर इ० मांर्गन, पूर्व अध्यक्ष, एन्टोख कालिज
5. डॉ० ए० लक्ष्मणस्वामी मुदालियर, कुलपति, मद्रास विश्वविद्यालय
6. डॉ० मेघनाद साहा, विज्ञान संकायाध्यक्ष, कलकत्ता विश्वविद्यालय
7. डॉ० कर्म नारायण बहल, प्रोफेसर, जन्तुविज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
8. डॉ० जान जे० टिगर्ट, मानद अध्यक्ष, फ्लोरिडा विश्वविद्यालय

सचिवश्री निर्मल कुमार सिद्धान्त, प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग तथा कला संकायाध्यक्ष, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

आयोग के उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र

ने उच्च एवं विश्वविद्यालयी शिक्षा के सम्बन्ध में प्रश्नावली तथा साक्षात्कार के द्वारा सूचनाएँ संकलित की तथा इनका विश्लेषण किया। सम्यक विचार-विमर्श के उपरान्त आयोग ने 25 अगस्त 1949 को 747 पृष्ठों का अपना प्रतिवेदन भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया।

  • तत्कालीन भारतीय विश्वविद्यालयों का अध्ययन कर उनके दोषों का पता लगाना
  • प्रशासन एवं वित्त के संबंध में सुझाव देना
  • उच्च शिक्षा के पुनर्गठन के संबंध में सुझाव देना
  • उच्च शिक्षा के उद्देश्य निश्चित करना
  • उच्च शिक्षा की पाठ्यचर्या में सुधार हेतु सुझाव देना

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने उच्च शिक्षा के उद्देश्यों, अध्यापक कल्याण, शिक्षा के स्तर, स्नातकोत्तर शिक्षा, अनुसंधान, शिक्षा के माध्यम, परीक्षा प्रणाली, धार्मिक शिक्षा, छात्र कल्याण, ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना, नारी शिक्षा तथा अर्थ व्यवस्था आदि में सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये।

माध्यमिक शिक्षा आयोग- 1952-53 (मुदालियर कमीशन)

माध्यमिक शिक्षा के संबंध में विस्तृत अध्ययन एवं माध्यमिक शिक्षा को अत्यधिक प्रभावशाली बनाने के उद्देश्य से इस आयोग का गठन किया गया।

भारत सरकार ने 23 सितम्बर सन् 1952 को डॉ० ए० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया।

इस आयोग में निम्न सदस्य थेः

अध्यक्ष – डॉ० ए० लक्ष्मण स्वामी मुदालियर, कुलपति, मद्रास विश्वविद्यालय
सदस्य 1. जान क्रिस्टी, प्राचार्य, जीसस कालिज, आक्सफोर्ड
2. केनेथ रस्ट विलियम्स, एसोसिएट डायरेक्टर, साउदर्न रीजनल ऐजुकेशन बोर्ड, अटलांटा
3. श्रीमती हंसा मेहता, कुलपति, बड़ौदा विश्वविद्यालय
4. जे० ए० तारापोरवाला, निदेशक, तकनीकी शिक्षा, बम्बई सरकार
5. डॉ० के० एल० श्रीमाली, प्राचार्य, विद्या भवन टीचर्स ट्रेनिंग कालिज, उदयपुर
6. एम० टी० व्यास, प्राचार्य, न्यू इरा स्कूल, बम्बई
7. के० जी० सैयेदेन, सह सचिव, शिक्षा मन्त्रालय, भारत सरकार
सदस्य सचिव ए० एन० बसु, सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ एजूकेशन, दिल्ली
सहायक सचिवडॉ० एस० एम० एम० चारी, ऐजूकेशन आफिसर, शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार

आयोग को निम्न बिन्दुओं के सन्दर्भ में उपाय सुझाने का कार्य दिया गया था –
(i) माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य, संगठन तथा विषयवस्तु
(ii) इसका प्राथमिक, बेसिक तथा उच्च शिक्षा से सम्बन्ध
(iii) विभिन्न प्रकार के माध्यमिक स्कूलों में परस्पर सम्बन्ध
(iv) अन्य समस्याएँ

स्पष्ट है कि इस आयोग के गठन का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा की समस्याओं का अध्ययन करके उनके सम्बन्ध मे सुझाव देना था। प्रश्नावली व साक्षात्कारों की सहायता से माध्यमिक शिक्षा की विविध समस्याओं का परिचय पाकर आयोग ने उनका समाधान खोजने का प्रयास किया।

आयोग ने 29 अगस्त, 1953 को 240 पृष्ठों का अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को प्रस्तुत किया।

राष्ट्रीय शिक्षा आयोग – 1964-66 (कोठारी कमीशन)

भारत सरकार ने शिक्षा के पुनर्गठन पर समग्र रूप से सोचने-समझने और देश भर के लिए समान शिक्षा नीति का निर्माण करने के उद्देश्य से 14 जुलाई 1964 को डॉ० दौलत सिंह कोठारी (तत्कालीन अध्यक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की अध्यक्षता में 17 सदस्यीय  राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया।

इस आयोग के अध्यक्ष के नाम पर इसे कोठारी आयोग भी कहते हैं।

इस आयोग ने कार्य संपन्न करने के लिए दो विधियों का अनुसरण किया-

  • पहली– निरीक्षण एवं साक्षात्कार
  • दूसरी -प्रश्नावली प्रश्नावली

प्रश्नावली लगभग 5000 व्यक्तियों के पास भेजा गया जिसमें से 2400 व्यक्तियों ने भर कर लौटाया।

इस आयोग ने सभी स्तरों की शिक्षा के सम्बन्ध में विचार-विमर्श किया तथा भारत सरकार को 29 जून, 1966 को अपना प्रतिवेदन ‘शिक्षा एवं राष्ट्रीय प्रगति’ (Education and National Development) भारत सरकार को प्रेषित किया।

प्रतिवेदन लगभग 700 पृष्ठों का एक वृहद दस्तावेज है जिसमें तीन खंड है –

  • प्रथम खण्ड में 6 अध्याय हैं , जिसका मुख्य बिंदु –शिक्षक व्यवस्था का पुनर्निर्माण
  • द्वितीय खण्ड में 11 अध्याय हैं , जिसका मुख्य बिंदु –शिक्षा का विभिन्न स्तर एवं वर्ग
  • तृतीय खण्ड में 2 अध्याय हैं , जिसका मुख्य बिंदु –प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था

आयोग ने राष्ट्रीय विकास में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में विकसित करने के लिए राष्ट्रीय उद्देश्य बताये तथा सम्पूर्ण राष्ट्र में एक समान शिक्षा संरचना लागू करने की सिफारिश की। आयोग ने अध्यापक प्रशिक्षण, शैक्षिक समानता, स्कूल शिक्षा के विस्तार, पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति व निरीक्षण, उच्च शिक्षा के उद्देश्यों व कार्यक्रम, विश्वविद्यालयों की व्यवस्था, कृषि तकनीकी, व्यावसायिक ब इंजीनियरिंग शिक्षा अनुसंधान, प्रौढ़ शिक्षा, नियोजन व प्रशासन तथा शैक्षिक वित्त-प्रबन्ध जैसे विषयों पर विस्तार से अध्ययन करने के सुझाव प्रस्तुत किए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968

भारत सरकार ने 5 अप्रैल 1967 को संसद सदस्यों की एक समिति का गठन किया।

इस समिति के तीन कार्य थे-

  1. कोठारी कमीशन के सुझावों पर गंभीरता से विचार करना
  2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार करना
  3. प्राथमिकताओं के आधार पर उसके क्रियान्वयन की रूपरेखा तैयार करना

24 जुलाई 1968 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई।

मूल तत्व –

  • राष्ट्रीय शिक्षा राष्ट्रीय महत्व का विषय है
  • शिक्षा की व्यवस्था केंद्र एवं राज्य सरकार का संयुक्त उत्तरदायित्व है
  • शिक्षा पर केंद्रीय बजट का 6% किया जाएगा
  • संपूर्ण देश में 10+2+3 शिक्षा संरचना लागू की जाएगी
  • अनिवार्य एवं निशुल्क प्राथमिक शिक्षा (6 से 14 आयु वर्ग तक)
  • माध्यमिक शिक्षा का उन्नयन
  • त्रिभाषा सूत्र लागू करना
  • विश्वविद्यालय शिक्षा का प्रसार
  • कृषि, व्यवसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, इंजीनियरिंग शिक्षा की व्यवस्था
  • विज्ञान शिक्षा वैज्ञानिक अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिया जाना
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार किया जाना

कोठारी आयोग के सुझाव के अनुरूप भारत सरकार ने इस नीति की घोषणा की थी। इस नीति ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन करने तथा सभी स्तरों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने पर बल दिया गया था। निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा के संवैधानिक संकल्प को पूरा करने, अध्यापकों के स्तर व प्रशिक्षण में सुधार करने त्रिभाषा सूत्र को लागू करने, शिक्षा प्राप्ति का अवसर सभी को सुलभ कराने, प्रतिभाओं की खोज व उनका विकास करने, कार्य अनुभव व राष्ट्रीय सेवा को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने, विज्ञान, कृषि व उद्योगों की शिक्षा व अनुसंधान को प्रोत्साहित करने, परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय व वैध बनाने, अल्पसंख्यकों की शिक्षा को बढ़ाने तथा 10+2+3 के शैक्षिक ढांचे को सम्पूर्ण राष्ट्र में लागू करने जैसे अनेक संकल्प इस शिक्षा नीति में किये गये थे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986

1977 में केंद्र में जनता दल सत्तारूढ़ हुआ और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

मोरारजी देसाई ने 10+2+3 शिक्षा संरचना  के स्थान पर 8+4+3 शिक्षा संरचना का विचार प्रस्तुत किया परंतु 8+4+3 शिक्षा संरचना सत्ता के द्वारा लागू नहीं किया जा सका था कि 1980 में कांग्रेस सत्ता में आ गई।

शिक्षा की चुनौती : नीति सम्बन्धी परिप्रेक्ष्य नाम से शिक्षा का सर्वेक्षण (68 पृष्ठों का दस्तावेज) अगस्त 1983 में प्रकाशित किया गया।

इस सर्वेक्षण में 1951 से 1983 तक की प्रगति सफलताओं और सफलताओं का वर्णन किया गया है।

शिक्षा की चुनौती : नीति सम्बन्धी परिप्रेक्ष्य नामक दस्तावेज के सुझाव के आधार पर मई 1986 में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति के प्रारूप को अंतिम रूप देकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 1986 को तैयार करके जारी कर दिया।

इस नवीन राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सुचारू ढंग से लागू करने के लिए एक कार्यान्वयन कार्यक्रम (POA) भी तैयार किया गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 1986 को कुल 12 खण्ड  में विभाजित किया गया है जिनमें 157 बिंदुओं के अन्तर्गत नई शिक्षा नीति को लिपिबद्ध किया गया है।

सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा शिक्षा की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की राष्ट्रीय घोषणा की गई। इस नीति में राष्ट्रीय विकास में शिक्षा की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। इस नीति में 10+2+3 की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को अपनाने, शैक्षिक अवसरों की एक समान उपलब्धता सुनिश्चित करने, विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन करने, तकनीकी व प्रबन्ध शिक्षा में सुधार करने, अध्यापकों के उत्तरदायित्वों को सुनिश्चित करने, सुधरी छात्र सेवाएँ, पाठ्यक्रमों के अभिनवीनीकरण करने, अध्यापक शिक्षा में सुधार करने, राष्ट्रीय सेवा प्रारम्भ करने, शैक्षिक निवेश को बढ़ाने, नवोदय विद्यालय खोलने, उपाधि को नौकरी से विलग करने, स्वायत्तता को बढ़ाने, कम्प्यूटर ज्ञान का विस्तार करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने जैसे संकल्प किये गये हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

भारत जैसे विशाल राष्ट्र में सबको शिक्षित करना तथा रोजगार उपलब्ध कराना एक चुनौती पूर्ण एवं अत्यन्त आवश्यक कार्य है ऐसे में सबको शिक्षा प्रदान करना उनमें कौशलों को विकसित करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक पूर्व इसरो (ISRO) प्रमुख पद्म विभूषण डॉ. के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में जून, 2017 में ‘कस्तूरीरंगन समिति’ का गठन किया।

इस समिति ने मई, 2019 में ’राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा’ कैबिनेट को प्रस्तुत किया। केन्द्र सरकार ने 34 वर्ष पुरानी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986’ को प्रतिस्थापित करते हुए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दे दी ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, 21वीं शताब्दी की पहली शिक्षा नीति है।

यह नीति वर्तमान की 10 + 2 वाली स्कूली व्यवस्था को 3 से 18 वर्ष के सभी बच्चों के लिए पाठ्यचर्या और शिक्षण-शास्त्रीय आधार पर 5 + 3 + 3 + 4 की एक नयी व्यवस्था में पुनर्गठित करने की बात करती है।

वर्तमान में 3 से 6 वर्ष की उम्र के बच्चे 10 + 2 वाले ढांचे में शामिल नहीं हैं क्योंकि 6 वर्ष के बच्चों को कक्षा 1 में प्रवेश दिया जाता है। नए 5+3+3+4 ढांचे में 3 वर्ष के बच्चों को शामिल कर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) की एक मजबूत बुनियाद को शामिल किया गया है जिससे आगे चलकर बच्चों का विकास बेहतर हो, वे बेहतर उपलब्धियां हासिल कर सकें और खुशहाल हों।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत केन्द्र व राज्य सरकार के सहयोग से शिक्षा के क्षेत्र में देश की जी.डी.पी. के 6% हिस्से के बराबर निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य

  • शिक्षा की पहुँच, समानता, गुणवत्ता वहन करने योग्य शिक्षा और उत्तरदायित्व जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देना है।
  • छात्रों को जरूरी कौशलों एवं ज्ञान से लैस करना और विज्ञान तकनीकी, अकादमिक क्षेत्रों में कुशल बनाना है।
  • छात्रों में तार्किक निर्णय, रचनात्मक सोच, और नवाचार की भावना को प्रोत्साहित करना, भाषाई बाध्यताओं को दूर करने, दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा को सुगम बनाने आदि के लिए तकनीकी के प्रयोग बढ़ावा देने पर बल देना।

4 thoughts on “भारतीय शिक्षा का इतिहास एवं विकास”

  1. बहुत सुंदर .. बहुत ही सरल तरीके से सटीक व स्पष्ट जानकारी

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