अधिगम के नियम तथा उनकी शिक्षा में उपयोगिता (Laws of Learning and their Educational Utility)

अधिगम के नियम तथा उनकी शिक्षा में उपयोगिता (Laws of Learning and their Educational Utility)

थार्नडाइक (Thorndike) ने कई प्रयोगों के आधार पर अधिगम के भिन्न-भिन्न नियम दिए हैं। इन सभी नियमों को दो शीर्षकों में बांटा जाता है—प्रधान (Primary) तथा गौण (Secondary)

(क) अधिगम के प्रधान नियम (Primary Laws of Learning) 

तैयारी या तत्परता का नियम (Law of Readiness)

इस नियम को प्रेरणा का नियम (Law of motivation) भी कहा जाता है। वुडवर्थ (Woodworth) इसको मानसिक तैयारी (Mental set) का नियम कहता है। इस नियमानुसार जब हम अधिगम के लिए तैयार होते हैं तो हम शीघ्रता से प्रभावशाली ढंग से सन्तुष्टि से सीख जाते हैं। परन्तु जब हम अधिगम के लिए तैयार नहीं होते तो ऐसा नहीं होता किसी कार्य के अधिगम के लिए विद्यार्थी को मानसिक तौर पर तैयार होना चाहिए।

शिक्षा में उपयोगिता/निहितार्थ (Educational Utility Implications)

1. विद्यार्थियों को प्रेरणा (Motivating the students) – पाठ पढ़ाने से पहले बच्चों को विशेष कार्य के लिए तैयार करना चाहिए ताकि अधिगम का कार्य तेज़, आसान, प्रभावशाली तथा स्थायी हो सके। प्रेरणा, जो कि अधिगम का एक महत्त्वपूर्ण कारक है, तैयारी पर निर्भर है अर्थात् यदि विद्यार्थी को उचित प्रेरणा मिले तो वह कार्य के लिए तैयार हो जाएगा और अपनी सभी शक्तियां लगा देगा। इसलिए अध्यापक को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को प्रेरित करे।

2. ध्यान तथा रुचि पैदा करना (Arousing attention and interest ) – अध्यापक को चाहिए कि वह उचित प्रश्न पूछ कर विद्यार्थियों में ध्यान तथा रुचि पैदा करे।

3. जिज्ञासा पैदा करना (Arousing curiosity) – अधिगम के लिए जिज्ञासा बहुत ही आवश्यक है। इसलिए अध्यापक को विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करनी चाहिए।

अभ्यास का नियम (Law of Exercise)

इस नियम को उपयोग तथा अनुपयोग का नियम भी कहा जाता है ‘अभ्यास मनुष्य को दक्ष बना देता है’ (“Practice makes a man perfect”) एक प्रसिद्ध कहावत है।

उपयोग का नियम (Law of use)

जब किसी परिस्थिति तथा उत्तर के बीच सुधार योग्य सम्बन्ध कायम किया जाता है तो उस सम्बन्ध की शक्ति, जबकि अवस्थाएं समान हों, बढ़ती है।

(When a modifiable connection is made between a situation and a response, that connection’s strength is, other things being equal increased.)

अनुपयोग का नियम (Law of disuse)

जब किसी समय के लिए परिस्थिति तथा उत्तर के बीच सुधार योग्य सम्बन्ध कायम नहीं होता तो शेष अवस्थाएं समान होते हुए, उसकी शक्ति कम होती है।

(When as modifiable connection is not made between a situation and a response over a length of time, that connection’s strength is, other things being equal, decreased.)

यदि किसी कार्य को दोहराया जाये तो वह प्रभावशाली ढंग से सीखा जा सकता है। दोहराई के अभाव के कारण मनुष्य भूल जाता है।

(If any activity is repeated again and again, it is learnt effectively and lack of repetition causes forgetfulness.)

शिक्षा में उपयोगिता (Educational Implications)

1. आदतों का निर्माण (Formation of habits) – इसके कारण आदतें बनती हैं अर्थात् यदि अच्छे कार्यों को बार-बार दोहराया जाए तो वे आदत बन जाते हैं। इसलिए अध्यापक का यह कर्तव्य है कि वह देखे कि बच्चों को अच्छे कार्य करने का अभ्यास मिलता रहे।

2. बुरी आदतों का लोप (Elimination of bad habits)- डनलप बीटा (Dunlop Beta) के अधिगम के नियमानुसार यदि बच्चों को सचेत अभ्यास कराया जाए तो उनकी बुरी आदतें उन्हें अपने आप छोड़ जाती है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी बच्चे को अंगूठा चूसने या दांतों से नाखून काटने की आदत है तो अध्यापक को चाहिये कि वह उस बच्चे को अपनी आदत सचेत तौर पर दोहराने के लिये कहे। इसके पीछे यह व्यवहार कार्य करता है कि वह अपनी गलती के बारे सचेत हो जायेगा और उसे भविष्य में दूर कर देगा।

3. लिखाई सुधार (Improvement of handwriting) – अभ्यास द्वारा लिखाई सुधारी जा सकती है।

4. शुद्ध उच्चारण (Correct pronunciation)- अभ्यास द्वारा शुद्ध उच्चारण सीखा जा सकता है और गलत उच्चारण की दोहराई को छोड़ने से भुलाया जा सकता है।

5. भूलने के तत्त्व को स्थगित करना ( Delaying the element of forgetfulness) – भूलने के तत्व को स्थगित किया जा सकता है क्योंकि अभ्यास द्वारा कार्य पक्के हो जाते हैं। अभ्यास से भूलना कुछ हद तक रोका जा सकता है।

6. कलाओं का विकास (Development of skills) – संगीत, चित्रकारी, टाईप करना, शार्टहैंड और खेल आदि कलाओं को इस नियम की सहायता से अधिक-से-अधिक विकसित किया जा सकता है।

प्रभाव का नियम (Law of Effect)

इसे प्रसन्नता तथा दुःख का नियम (Law of Pleasure and Pain) अथवा सन्तुष्टि तथा कष्ट का नियम (Law of Satisfaction and Annoyance) कहा जाता है। प्रत्येक कार्य का कुछ न कुछ प्रभाव होता है। कई कार्यों का अन्त प्रसन्नता होती है तथा कई कार्यों का अन्त दुःख। सन्तुष्टि अथवा प्रसन्नता से सम्बन्धित कार्य को बार-बार दोहराने से अधिगम के कार्य को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। वे कार्य जिनका सम्बन्ध असन्तोष, दुःख, दण्ड या कष्ट के साथ होता है, नहीं दोहराए जाते और उनकी शक्ति कम होती है। थार्नडाइक (Thorndike) ने इस नियम की परिभाषा इस प्रकार दी है-

‘जब किसी परिस्थिति तथा उत्तर के बीच सुधार योग्य सम्बन्ध कायम हो जाता है और उसके साथ संतोषजनक अवस्था का मेल हो जाता है तो उस सम्बन्ध की शक्ति बढ़ती है परन्तु जब उसके साथ कष्ट जुड़ा होता है तो उसकी शक्ति कम हो जाती है।’

(“When a modifiable connection between a situation and response is made and is accompanied by a satisfying state of affairs, that connection’s strength is increased, but when made and accompanied by an annoying state of affairs its strength is decreased.”)

शिक्षा में उपयोगिता (Educational Implications)

1. अच्छी अभिवृत्तियां तथा आदतें पैदा करना (Formation of good attitudes and habits) – इस नियम की सहायता से अच्छी अभिवृत्तियां तथा आदतें पैदा की जा सकती हैं। दण्ड, दुःख या असन्तुष्टि के साथ सम्बन्धित करके बुरी आदतें दूर की जा सकती हैं।

2. क्रोध तथा ईर्ष्या के संवेग (Emotion of anger and jealousy) – इस नियम की सहायता से क्रोध तथा ईर्ष्या के संवेग को दूर किया जा सकता है क्योंकि क्रोध और ईर्ष्या को असंतुष्टि या कष्ट की अवस्था के साथ है जोड़ा जा सकता है।

3. पुरस्कार तथा दण्ड के सिद्धान्त की निर्भरता (Dependence of reward and punishment) – पुरस्कार तथा दण्ड का सिद्धान्त इस नियम पर निर्भर है। अच्छे व्यवहार का सम्बन्ध पुरस्कार और बुरे व्यवहार का सम्बन्ध दण्ड के साथ जोड़ा जा सकता है।

4. उचित मनोभावों का विकास (Development of desirable sentiments) – इस नियम द्वारा विद्यार्थियों में उचित मनोभावों/स्थायी भावों को विकसित किया जा सकता है। धनात्मक (Positive) मनोभावों का सम्बन्ध परिस्थितियों की सन्तोषजनक अवस्था के साथ जोड़ा जा सकता है।

5. समस्या तथा कदाचारी व्यवहार का सुधार (Problem and delinquent behaviour) – समस्या तथा कदाचारी व्यवहार को दण्ड के साथ सम्बन्धित करके सुधारा जा सकता है।

6. रुचि इस नियम से सम्बन्धित है (Interest is related to this law) – रुचि का इस नियम के साथ सीधा सम्बन्ध है रुचि से सन्तुष्टि पैदा होती है, सन्तुष्टि अधिगम को उन्नत करती है और अच्छे अधिगम से अधिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है। विषयों, पुस्तकों, शुगलों, खेलों और पाठ सम्बन्धी सरगर्मियों के चुनाव में बच्चे रुचि वाली चीजों को प्राथमिकता देते हैं।

7. स्मृति इस नियम से सम्बन्धित है (Memory is connected with this law) – प्रभाव के नियम के साथ स्मृति का भी सम्बन्ध है। रोचक चीजें अरोचक चीज़ों की अपेक्षा शीघ्र याद हो जाती हैं।

प्रभाव के नियम के दोष (Limitations of Law of Effect) 

(1) कई बार पुरस्कार से दण्ड अधिक प्रभावशाली होता है। (2) कई बार रोचक अनुभवों की अपेक्षा अरोचक अनुभव अधिक याद रहते हैं।

(ख) अधिगम के अप्रधान/गौण नियम (Minor/Subsidiary Laws of Learning) 

विभिन्न या बहु-अनुक्रिया उत्तर का नियम (Law of varied response or multiple response)

एक व्यक्ति के एक परिस्थिति के बारे विभिन्न अनुक्रियायें होती हैं। थार्नडाइक की बिल्ली ने पिंजरे से बाहर निकलने के लिए विभिन्न प्रयत्न किये।

पूर्व निश्चयों, अभिवृत्तियों तथा मतों का नियम (Law of previous beliefs, attitudes and opinions)

इस नियम द्वारा पता लग जाता है कि व्यक्ति का उत्तर सन्तोषजनक होगा या असन्तोषजनक। थार्नडाइक के अनुसार पेट भर खाने के बाद बिल्ली पिंजरे में सो जाती है परन्तु खाली पेट बिल्ली उसमें से बाहर निकलने की कोशिश करती है।

आंशिक क्रिया का नियम (Law of partial activity)

इस नियमानुसार विद्यार्थी इस योग्य होता है कि आवश्यक तत्त्व को अनावश्यक तत्त्व से अलग कर सके।

अनुक्रिया समानता अथवा आत्मीकरण का नियम (Law of response analogy or assimilation)

विद्यार्थी नई परिस्थिति के प्रति वैसे ही व्यवहार करता है जैसे उसने पहले उसी प्रकार की परिस्थिति में किया होता है। अतः नई परिस्थिति पहले जैसी होगी।

साहचर्य परिवर्तन का नियम (Law of associative shifting)

इस नियम को अनुकूल अनुक्रिया का नियम (Law of conditioned response) भी कहा जाता है। अनुक्रिया को एक परिस्थिति से दूसरी तक, जो कि उस समय प्रस्तुत की जाती है, बदला जा सकता है।

अधिगम के नियम तथा उनकी शिक्षा में उपयोगिता (Laws of Learning and their Educational Utility)

अधिगम के कुछ और गौण नियम ये हैं

(i) नवीनता का नियम (Law of recency) – इस नियमानुसार नई चीज़ जल्दी याद हो जाती है। इसलिये विद्यार्थियों को परीक्षा से कुछ देर पहले अपनी पुस्तकों की दुहराई करनी चाहिए।

(ii) प्राथमिकता का नियम (Law of primacy) – एक कथन है कि पहला प्रभाव अन्तिम प्रभाव होता है। (First impression is the last impression.)। मालूम होता है कि वे प्रभाव जो बच्चा आरम्भिक अवस्था में ग्रहण करता है, स्थायी होते हैं। इसलिए बच्चों तथा अध्यापकों को पहले से ही बहुत गम्भीर होना चाहिए।

(iii) सम्बन्धता का नियम (Law of belongingness) – यह नियम बताता है कि यदि उत्तर स्थिति से सम्बन्ध रखता हो तो सम्बन्ध को बहुत जल्दी याद किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यदि यह सम्बन्ध उत्तेजक तथा उत्तर के बीच प्राकृतिक है तो अधिगम अधिक प्रभावशाली हो सकता है। इसलिए अध्यापक को श्रेणी में प्राकृतिक वातावरण पैदा करना चाहिए और बच्चों की प्राकृतिक रुचियों को अपील करनी चाहिए।

(iv) उत्तेजक की तीव्रता का नियम (Law of intensity of stimulus ) – इस नियमानुसार यदि एक उत्तेजक बलवान् है तो उसकी अनुक्रिया भी बलवान् होगी और यदि उत्तेजक कमज़ोर है तो उसकी अनुक्रिया भी कमज़ोर होगी। परीक्षायें शिक्षण के लिए तीव्र उत्तेजक सिद्ध होती हैं, इसलिए उनका अधिगम पर धनात्मक प्रभाव पड़ता है।

My name is Achyut Kumar. I am an Assistant Professor by profession.

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