प्रकृतिवाद का अर्थ, स्वरूप एवं मूल सिद्धान्त

प्रकृतिवाद का उद्भव 18वीं शताब्दी की यूरोप की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र की क्रान्ति के परिणामस्वरूप हुआ। यह क्रान्ति धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध हुई थी। यूरोप में प्रभुतावाद (Absolutism), नियमित विनय (Formalism) एवं एकतन्त्रवाद (Monarchy) का प्रभुत्व था जिसे लोग किसी भी स्थिति में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस क्रान्ति के पूर्व पुनरुत्थान काल (Renaissance) एवं सुधारवाद (Reformation) का रूप ग्रहण किया। पुनरुत्थान काल तथा सुधारवाद के उपरान्त इस क्रान्ति ने यथार्थवाद (Realism), प्यूरिटैनिज्म (Puritanism) एवं पीएटिज्म (Pietism) का और अन्त में प्रकृतिवाद (Naturalism) का रूप धारण किया। प्रकृतिवादी मत के दो समर्थक वाल्टेयर (Waltair) एवं रूसो (Rousseau) थे। इनका मानना था कि मनुष्य धार्मिक एवं सामाजिक बन्धनों से मुक्त हो जिससे कि वह अपने जीवन एवं नैतिक स्तर को बढ़ा सके। इस विचारधारा के अन्य समर्थक एवं पोषकों के अन्तर्गत अरस्तू, काम्टे, हॉब्स बेकन, डार्विन, लैमार्क हक्सले स्पेन्सर, बर्नार्ड शॉ आदि चिन्तकों का नाम आता है।

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प्रकृतिवाद का अर्थ (Meaning of Naturalism)

प्रकृतिवाद यथार्थ पर आधारित एक भौतिकवादी दर्शन है। इसका मूल तत्व प्रकृति है। प्रकृति एक वस्तु है जिससे इतर कोई यथार्थ नहीं है, इसी वजह से प्रकृतिवाद, आदर्शवाद एवं प्रयोजनवाद से भिन्न है। इस मत के अनुसार इस संसार का कारण और कर्त्ता  दोनों ही प्रकृति है। प्रकृति मनुष्य के लिए कल्याणकारी है। मनुष्य की प्रकृति सदा शुद्ध और पवित्र होती है।

प्रकृतिवादी प्रकृति के ज्ञान को वास्तविक मानते हैं। प्रकृतिवाद तत्वमीमांसा का वह रूप है जो प्रकृति, प्राकृतिक नियमों एवं प्राकृतिक तत्वों को सत्य एवं वास्तविक मानते हैं। इस मत के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रकृति के गर्भ से उत्पन्न हुई है और अन्ततः प्रकृति में ही पुनः विनष्ट होकर मिल जाती है। प्रकृतिवाद में भौतिक तत्वों को प्रधानता प्रदान की गई है। संक्षिप्त रूप में हम कह सकते हैं कि

“प्रकृतिवाद वह विचारधारा है जो आध्यात्मिक तत्वों को अस्वीकार करते हुए प्रकृति को अन्तिम सत्ता मानती है और मानव के प्राकृतिक स्वरूप के आधार पर सभी वस्तुओं की व्याख्या करती है।”

प्रकृतिवाद

प्रकृतिवाद की परिभाषाएँ (Definitions of Naturalism)

जेम्स वार्ड के अनुसार, “प्रकृतिवाद वह सिद्धान्त है जो कि प्रकृति को ईश्वर से पृथक् करता है, आत्मा को पुद्गल के अधीन करता है और अपरिवर्तनशील नियमों को सर्वोत्तम मानता है।”
“Naturalism is the doctrine which separates nature from God, subordinates spirit to matter and setup unchangeable laws supreme.”-James Ward

ज्वायसे के अनुसार, “प्रकृतिवाद वह विचारधारा है जिसकी प्रमुख विशेषता आध्यात्मिकता को अस्वीकार करना है या प्रकृति एवं मनुष्य के दार्शनिक चिन्तन में उन बातों को स्थान देता है जो हमारे अनुभवों से परे है।”
“Naturalism is a system whose salient characteristic is the exclusion of whatever is spiritual or indeed whatever is transcedental of experience from our philosophy of nature and man.” –Joyce

रस्क के अनुसार, “प्रकृतिवाद पदार्थ के उसी रूप से सन्तुष्ट हो जाता है, जिस रूप में वह उसे पाता है। वह सामाजिक सहयोग की अपेक्षा व्यक्तिगत अधिकार पर अधिक बल देता है।
“Naturalism is content to take things, as it finds them. It emphasises individual assertion as against social co operation.”-Rusk

हकिंग के अनुसार, “प्रकृतिवाद वह तत्वमीमांसा है, जो प्रकृति को पूरी तरह सच मानती है। वह प्रकृति या लोक से परे कुछ भी नहीं मानती।” “Naturalism is the metaphysics, which considers nature as the whole of reality. It includes whatever is supernatural or other wordly. -Hocking

एक भारतीय विचारक के अनुसार, “प्रकृतिवाद वह विचारधारा है जो कि प्रकृति एवं मनुष्य को भौतिक, यान्त्रिक एवं प्राणिशास्त्रीय रूप में देखती है, न कि यौगिक या आभास की दृष्टि से।”
“Naturalism is a system that views man and universe as phsyical. mechanical and biological and yogical or dehypothetical.” -An Indian Thinker

उपर्युक्त परिभाषाओं पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि इनसे प्रकृतिवाद के वास्तविक स्वरूप का पता नहीं चल रहा है इसलिए प्रकृतिवाद की तत्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा एवं आचारमीमांसा के समन्वित दृष्टिकोण से निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है-

“प्रकृतिवाद पाश्चात्य दर्शन की वह विचारधारा है जो इस ब्रह्माण्ड को प्रकृतिजन्य मानती है और यह मानती है कि यह भौतिक संसार ही सत्य है और इसके अतिरिक्त कोई आध्यात्मिक संसार नहीं है। यह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती और आत्मा को पदार्थजन्य चेतन तत्व मानती है और यह प्रतिपादन करती है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य सुखपूर्वक जीना है, जो प्राकृतिक जीवन जीने अर्थात् प्रकृति के अनुकूल जीवन बिताकर प्राप्त किया जा सकता है।”

प्रकृतिवाद के विभिन्न स्वरूप (Different Forms of Naturalism)

प्रकृतिवाद के विभिन्न स्वरूप (Different Forms of Naturalism) निम्नलिखित हैं-

पदार्थ विज्ञानों का प्रकृतिवाद (Naturalism of Physical Science)

पदार्थ विज्ञानों का प्रकृतिवाद वह प्रकृतिवाद है जो पदार्थ जगत् को समझाने की भावना पर विशेष बल देता है। यह वाद मानव को पदार्थ जगत् के नियमों के अनुसार समझने का प्रयास करता है। फलस्वरूप शिक्षा इससे प्रभावित नहीं होती क्योंकि यह (शिक्षा) एक मानवीय क्रिया है।

यन्त्रवादी प्रकृतिवाद (Mechanical Naturalism)

प्रकृतिवाद की यह विचारधारा औद्योगिक प्रकृति पर निर्भर करती है। इस धारा में मनुष्य को एक यन्त्र या मशीन समझ लिया गया है, परन्तु जेम्स रॉस (James Ross) का विचार है कि इसकी शिक्षा सम्बन्धी कुछ उपयोगिता भी है। इस विचारधारा के आधार पर व्यवहारवादी मनोविज्ञान का आविर्भाव हुआ। यन्त्रवादी प्रकृतिवाद समस्त विश्व को एक बड़े यन्त्र के रूप में देखता है। व्यक्ति इस पूरे यन्त्र का एक भाग भी है और स्वयं में एक यन्त्र भी है। जब इस यन्त्र को एक बार प्रारम्भ कर दिया जाता है, फिर किसी मन या आत्मा की शक्ति को नहीं माना जाता। इसलिए व्यवहारवादी शिक्षा के अन्तर्गत ‘सम्बद्ध प्रतिक्रिया’ और ‘क्रिया द्वारा सीखना’ इन दोनों सिद्धान्तों पर बहुत अधिक बल दिया जाता है।

अतः यह कहा जा सकता है कि “मनुष्य केवल एक यन्त्र है। वह पूर्णरूपेण बाह्य प्रभावों के द्वारा संचालित होता है।उनके द्वारा कुछ उत्पन्न नहीं होता, यहाँ तक कि विचार भी।”

प्रकृतिवाद के विभिन्न स्वरूप

 

प्राणिशास्त्रीय अथवा जैविक प्रकृतिवाद (Biological Naturalism)

यह अवधारणा डार्विन (Darwin) के विकासवाद सिद्धान्त पर अवलम्बित है। इसके निम्नलिखित तीन सिद्धान्त हैं-

(A) परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालना (Adoption to Environment),
(B) जीवन के लिए संघर्ष (Struggle for Existence),
(C) समर्थ की जीत (Survival of the Fittest)

रॉस के अनुसार, “शिक्षा वातावरण में सामंजस्य स्थापित करने वाली प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मनुष्य को अपनी परिस्थितियों में तालमेल पैदा करने एवं समय से अनुकूलन के योग्य बनाना है।”

“Education is seen as the process of adjustment to environment, it aims at enabling the individual to be in harmony with and well-adapted to his surrounding.” ” -J.S. Ross

प्रायोगिक प्रकृतिवाद (Experimental Naturalism)

प्रकृतिवाद की इस विचारधारा पर विज्ञान का बहुत प्रभाव पड़ा है। प्रकृतिवाद के इस स्वरूप के अनुसार मानव जाति की सभी क्रियाओं और अनुभवों का अध्ययन तथा विश्लेषण किया जाना चाहिए और अलग-अलग प्रयोगों के आधार पर व्यक्ति और समाज के मूल्यों को निर्धारित करना चाहिए।

प्रकृतिवाद के मूल सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Naturalism)

प्रकृतिवाद के मूल सिद्धान्त (Fundamental Principles of Naturalism) निम्नलिखित हैं-

प्रकृतिवाद के मूल सिद्धांत

यह ब्रह्माण्ड एक प्राकृतिक रचना है

प्रकृतिवाद यह मानता है कि संसार का कर्त्ता और कारण, दोनों स्वयं प्रकृति ही है। प्राकृतिक तत्वों के संयोग से पदार्थ और पदार्थों से संसार की रचना होती है और उनके विघटन से उसका अन्त होता है। यह संयोग और विघटन की क्रिया कुछ निर्धारित नियमों के अनुसार होती है। इस बनने और बिगड़ने को प्राकृतिक परिवर्तन कहा जाता है। जैसे पानी से बर्फ और बर्फ से पानी बनने की क्रिया प्राकृतिक परिवर्तन ही है।

मात्र भौतिक संसार ही सत्य है, इसके अलावा कोई आध्यात्मिक संसार नहीं है

प्रकृतिवाद मात्र भौतिक संसार को ही सत्य मानते हुए कहता है क्योंकि इसे हम प्रत्यक्ष इन्द्रियों के माध्यम से कर एवं देख रहे हैं इसलिए यह सत्य है। इसके अलावा आध्यात्मिक संसार को हम इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं कर (देख) पा रहे हैं इसलिए यह असत्य है। प्रकृतिवाद पदार्थ को अनाशवान मानता है और कहता है कि वह मात्र रूप परिवर्तन करता है तो पदार्थ निर्मित संसार नाशवान एवं असत्य नहीं हो सकता है।

आत्मा पदार्थ-जन्य चेतन तत्व है

प्रकृतिवादी आत्मा के आध्यात्मिक स्वरूप को अस्वीकारते हुए कहते हैं कि यह संसार प्रकृति द्वारा निर्मित है और यह निर्माण कार्य निश्चित नियमानुसार होता है, इसके पीछे किसी आध्यात्मिक शक्ति (परमात्मा) की कल्पना एक असत्य विचार है। प्रकृति के पदार्थ परमाणुओं के संयोग से बनते हैं और परमाणुओं में क्रियाशीलता होती है। इसीलिए जड़ में जीव और जीव में चेतन का विकास होता है, आदर्शवादी इसी चेतन तत्व को आत्मा कहते हैं। प्रकृतिवादी यह मानते हैं कि आत्मा पदार्थजन्य है इसलिए शरीर के समाप्त होने पर आत्मा का भी विनाश हो जाता है।

मानव जीवन का लक्ष्य सुखपूर्वक जीना है

प्रकृतिवादियों के अनुसार प्रत्येक प्राणी में जीने की इच्छा होती है जिसके लिए वह संघर्ष करता है और स्वयं परिस्थिति के अनुसार सुरक्षित रहता है। मानव स्वयं को परिस्थिति के अनुसार ढालते हुए अपनी स्थिति के अनुसार परिस्थिति का निर्माण भी करता है इसलिए संसार के समस्त प्राणियों में सबसे अधिक सुख का भागीदार बनने में समर्थ हो गया।

मानव विकास एक प्राकृतिक क्रिया है

प्रकृतिवादी मानव विकास के लिए ‘विकास सिद्धान्त’ में आस्था रखते हैं। मानव का विकास सूक्ष्म और सरल प्राणियों से हुआ है। इस विकास की गति बहुत ही धीमी थी। मानव जीवों की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसमें सभी शक्तियाँ अपने-अपने उच्चतम विकास की स्थिति में पायी जाती हैं। मानव का व्यवहार इन्हीं शक्तियों के आधार पर निश्चित होता है। मनुष्य अपनी बाह्य परिस्थितियों से उत्तेजना पाकर अपना व्यवहार बनाता है।

सुखमय जीवन के लिए प्राकृतिक जीवन श्रेष्ठ है

प्रकृतिवादियों के अनुसार सभ्यता एवं संस्कृतिवश मानव प्रकृति से विमुख होने के कारण ही दु:खी है। क्योंकि मनुष्य की प्राकृतिक प्रकृति श्रेष्ठ एवं उत्तम है, वह मात्र आत्मरक्षा चाहता है और उसके इस काम में किसी प्रकार की बाधा न हो। उसकी प्रकृति में छल, कपट, द्वेष आदि अवगुण नहीं हैं इसीलिए प्रकृतिवाद मानव को उसकी प्रकृति के अनुसार स्वतन्त्र वातावरण में रखकर उसके स्वतन्त्र विकास का समर्थन करता है।

मानव संसार की सर्वश्रेष्ठ कृति है

प्रकृतिवादी मानव को संसार की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं। जीवविज्ञानवादियों के अनुसार मनुष्य में अन्य पशुओं की अपेक्षा कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जिनके द्वारा यह अन्य पशुओं से ऊपर उठने में सक्षम हुआ है। इन शक्तियों में मनुष्य की बुद्धि को विशेष महत्व प्राप्त है, बुद्धि मस्तिष्क की उपज है।

प्राकृतिक जीवन में शक्ति, सामंजस्य और परिस्थितियों पर नियन्त्रण का महत्व है

जीवविज्ञानवादी प्रकृतिवादियों का यह मानना है कि प्राकृतिक जीवन के खातिर सर्वप्रथम मानव में अपने जीवन रक्षा की शक्ति होनी चाहिए, तब प्राकृतिक वातावरण से सामंजस्य बनाने की शक्ति और उसके बाद अपनी परिस्थिति पर नियन्त्रण रखने की शक्ति होनी चाहिए। जिसमें इन शक्तियों का अभाव होगा, वह जिन्दा नहीं रह पायेगा।

राज्य ही केवल व्यावहारिक सत्ता है

प्रकृतिवादी यह मानते हैं कि राज्य को व्यक्ति के हित में कार्य करना चाहिए। एक व्यक्ति के शासन में जनता के हितों का ध्यान नहीं रखा जाता है। इसका विरोध करते हुए उन्होंने प्रजातन्त्र को व्यक्ति के विकास के लिए उचित माना है। शिक्षा पर राज्य का कठोर नियन्त्रण नहीं होना चाहिए।

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