राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 (NCF 2005)

‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ को प्रायः गलत समझा जाता है मानो यह एकरूपता लाने के लिए प्रस्तावित दस्तावेज हो। जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और प्रोग्राम ऑफ एक्शन (POA), 1992 में स्पष्ट किया गया उद्देश्य इसके ठीक विपरीत था। एन.पी.ई. ने नवीन पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तावित की ताकि वह ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के विकास का जरिया बने जिसमें यह सामर्थ्य हो कि वह भारत के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक वातावरण को दृष्टि में रखते हुए अकादमिक घटकों के साथ सामान्य आधारभूत मूल्य भी सुनिश्चित करें। अब हम इसी संदर्भ में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 का अध्ययन करेंगे।

Table of Contents

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005
(National Curriculum Framework 2005)

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा 2005 विद्यालयी शिक्षा पर नवीनतम राष्ट्रीय दस्तावेज है। इससे पूर्व भी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपेरखा बनी है। वर्ष 1976 में शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया। तभी से सम्पूर्ण राष्ट्र में संचालित विद्यालयों में कुछ मूलभूत बातों पर  शिक्षा को समानता से लागू करने का चिन्तन तीव्र गति से हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ने पूरे देश की स्कूल पाठ्यचर्या में समान तत्त्वों की सिफारिश की थी। राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 1988’ तैयार की गई, किन्तु बच्चों पर पाठयक्रम व पाठ्यपुस्तकों का भार बढ़ता ही गया। इसलिये शिक्षा के नाम पर बच्चों पर बढ़ते बोझ से मुक्ति दिलाने हेतु 1993 में प्रो. यशपाल का दस्तावेज ‘बिना बोझ की शिक्षा’ आया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की सिफारिशों के आधार पर प्रति पाँच वर्षों में एन0 सी0 एफ0 की पुनर्समीक्षा की बात कही गई, फलतः एन. सी. एफ., 2000 की पुनर्समीक्षा की गई। वर्तमान राष्ट्रीय सरकार ने पुरानी पाठ्यचर्या, 2000 की पुनर्समीक्षा कर, नई पाठ्यचर्या रूपरेखा निर्माण करने का निर्णय लेते हुए प्रो0 यशपाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया। इसके द्वारा शिक्षाविद् एवं सम्बन्धित विषय विशेषज्ञों के 21 फोकस समूहों की सहायता से राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा, 2005 तैयार किया गया। इस राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को तैयार करने के लिये जो 21 फोकस समूह बनाये गये हैं, ये बिन्दु निम्न प्रकार हैं-

  1. शिक्षा का लक्ष्य
  2. पाठ्यचर्या में बदलाव
  3. भारतीय भाषाओं का शिक्षण
  4. अंग्रेजी शिक्षण
  5. गणित शिक्षण
  6. विज्ञान शिक्षण
  7. सामाजिक विज्ञान शिक्षण
  8. आवास और सीखना
  9. कला, संगीत, नृत्य और रंगमंच
  10. हस्तशिल्पों की धरोहर
  11. कार्य और शिक्षा
  12. प्रारम्भिक बाल्यावस्था का विकास
  13. अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की समस्यायें
  14. शिक्षा में जेन्डर के मुद्दे
  15. शैक्षिक प्रौद्योगिकी
  16. स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा
  17. विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा
  18. शान्ति के लिये शिक्षा
  19. पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें
  20. पाठ्यचर्या नवीनीकरण के लिये अध्यापक शिक्षा
  21. परीक्षा सुधार

पाठ्यक्रम एक ऐसी संरचना है, जिसके कारण ज्ञान के भण्डार में वृद्धि होती है। यह विकासशील अवस्था में रहती है। समाज में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से पाठ्यक्रम में दिखाई पड़ता है। पाठ्यक्रम में समयानुसार परिवर्तन ही शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र की बहुत सारी समस्याओं के निदान हेतु एक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की आवश्यकता महसूस की गई, जिसको आधार मानते हुए सिद्धान्तों का निर्माण किया गया। इन सिद्धान्तों के आधार पर ही ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005’ के उद्देश्यों को निर्धारित किया गया। साथ ही समस्याओं के समाधान हेतु सुझावों को भी प्रस्तुत किया गया।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के सिद्धान्त
(Theories of  National Curriculum Framework, 2005)

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

मानवता का सिद्धान्त

मानवीय मूल्यों का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। मानवीय मूल्यों का महत्त्व न केवल भारतीय स्तर पर अपितु वैश्विक स्तर पर भी है। भारतीय परम्परा मानवीय मूल्यों पर आधारित रही है। इसलिये पाठ्यक्रम में प्रारम्भ से ही ऐसे प्रकरणों का समावेश किया गया है, जिससे छात्रों में प्रेम, सहयोग, परोपकार एवं सहिष्णुता की भावना का विकास हो सके।

एकता का सिद्धान्त

राष्ट्र की अखण्डता को सुनिश्चित करने के लिये पाठ्यक्रम में एकता के सिद्धान्त को अपनाया गया है। विभिन्न संस्कृतियों को एकता के सूत्र में पिरोते हुए धर्मनिरपेक्षता से सम्बन्धित विषयवस्तु को प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न भाषाओं के समाधान हेतु भी इस पाठ्यक्रम में विचार-विमर्श किया गया है।

नैतिकता का सिद्धान्त

भारतीय संस्कृति नैतिक मूल्यों पर आधारित रही है। नैतिक मूल्यों को आज भी उपयोगी व महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्येक अभिभावक व शिक्षक अपने बच्चों में नैतिक मूल्यों का समावेश करना चाहते हैं। अतः राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 में नैतिक मूल्यों के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। पाठ्यक्रम में प्राथमिक स्तर से ही शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से छात्रों में नैतिकता का विकास किया जाता है।

संस्कृति संरक्षण का सिद्धान्त

भारतीय संस्कृति विश्व की संस्कृतियों में सर्वश्रेष्ठ है। इसके संरक्षण एवं विकास के निरन्तर प्रयास किये जाते रहे हैं। भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्व, मानवता, नैतिकता, सामाजिकता, आदर्शवादिता एवं समन्वयता आदि को पाठ्यक्रम की विषयवस्तु में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इससे संस्कृति का संरक्षण होता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में संस्कृति के संरक्षण के सिद्धान्त को महत्त्व प्रदान किया गया है।

समायोजन का सिद्धान्त

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 का निर्माण करने से पूर्व उपलब्ध संसाधनों के समायोजन में विचार-विमर्श किया गया। इसके पश्चात् उपलब्ध संसाधनों में समन्वय करते हुए उनके सर्वाधिक उपयोग के महत्त्व को सुनिश्चित किया गया। इस प्रकार साधनों का उचित विदोहन एवं साधनों के मध्य समन्वय स्थापित करते हुए इस पाठ्यक्रम में समायोजन के सिद्धान्त का अनुकरण किया गया।

रुचि का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम की प्रभावशीलता एवं सफलता का मूल्यांकन तभी किया जाता है जब उसका अनुकूल प्रभाव शिक्षक, छात्र व समाज पर दृष्टिगोचर होता है। यह सर्वविदित है कि रुचि के अभाव में शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया प्रभावी रूप से नहीं चल सकती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के निर्माण के समय शिक्षकों की रुचि, छात्रों की रुचि व अभिभावकों की रुचि को विशेष स्थान दिया गया है।

सन्तुलित विकास का सिद्धान्त

समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सन्तुलन बना रहे, इस हेतु राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में सन्तुलित विकास के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। जैसे—नैतिक एवं मानवीय मूल्यों को पाठ्यक्रम में उचित स्थान देना, आदर्शवाद को प्रयोजनवाद की तुलना में कम स्थान प्रदान करना आदि। इससे समाज का विकास पूर्णतः सन्तुलित रूप में होगा तथा इस प्रकार एक आदर्श समाज का सपना साकार हो सकेगा।

आदर्शवादिता का सिद्धान्त

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना में आदर्शवादिता के सिद्धान्त को महत्त्व प्रदान करते हुए आदर्शवादी परम्परा का अनुकरण किये जाने पर बल दिया है। ईश्वर की सत्ता एवं महानता के बारे में छात्रों को प्रारम्भिक स्तर से ही ज्ञान कराया जाता है। भौतिकता के साथ-साथ आदर्शवादिता का भी जीवन में समावेश होना अत्यन्त आवश्यक है।

सामाजिकता का सिद्धान्त

समाज और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। पाठ्यक्रम में सामाजिक पहलू को विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में उन सभी तों एवं प्रकरणों का समावेश किया है, जो स्वस्थ एवं आदर्श समाज का निर्माण करते हैं। इस पाठ्यक्रम में सामाजिकता के सिद्धान्त को महत्त्व दिया गया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में उन सभी सिद्धान्तों को महत्त्व दिया गया है जो कि उत्तम पाठ्यक्रम की संरचना में सहायक सिद्ध होते हैं। पाठ्यक्रम की विषयवस्तु एवं सामाजिक परिस्थितियों ने समन्वय स्थापित करते हुए छात्र के लिये सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के उद्देश्य
(Objectives of National Curriculum Framework 2005)

सर्वप्रथम किसी भी प्रकार के शैक्षिक कार्यक्रम को सफल व प्रभावशाली बनाने हेतु सिद्धान्तों के आधार पर उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है, जिससे कि पाठ्यक्रम एवं योजना का निर्धारण किया जा सके। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 के प्रमुख उद्देश्यों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है-

अभिभावकों की आकांक्षाओं की पूर्ति

अभिभावक शिक्षा के माध्यम से अपनी आकांक्षा-पूर्ति विद्यार्थी के माध्यम से करना चाहते हैं, यानि प्रत्येक अभिभावक अपने बालक को विद्यालय भेजने के पश्चात् उससे कुछ आशाएँ रखता है। इन आशाओं की पूर्ति स्कूल व्यवस्था एवं स्कूल पाठ्यक्रम पर आधारित है। अतः अभिभावकों की आशाओं को ध्यान में रखकर इस पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया है। अतः अभिभावकों की आकांक्षा-पूर्ति राष्ट्रीय पाठ्यक्रम 2005 का मुख्य उद्देश्य है।

शारीरिक एवं मानसिक विकास में समन्वय

विद्यार्थियों के विकास के दो प्रमुख पक्ष होते हैं, जिनका सम्बन्ध शारीरिक एवं मानसिक विकास से होता है। इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों के मानसिक विकास के लिए सैद्धान्तिक विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है तथा शारीरिक विकास के लिए खेलकूद एवं अन्य प्रायोगिक कार्यों को पाठ्यक्रम में स्थान प्रदान किया है। इस प्रकार पाठ्यक्रम को मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से विद्यार्थियों के अनुकूल बनाकर मानसिक एवं शारीरिक विकास के उद्देश्य को पूर्ण किया है।

राष्ट्रीय एकता का विकास

भारत प्राचीन काल से ही अनेकता में एकता के लिये प्रसिद्ध रहा है। देश की एकता एवं अखण्डता से सम्बन्धित विषयवस्तु को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 में अधिक महत्त्व प्रदान किया है। भारत विभिन्न धर्मों, भाषाओं एवं परम्पराओं का देश होने के कारण, सामान्य जनजीवन में प्रतिकूल प्रभाव डालता है। विचारधारायें भिन्न होने पर एकता की आवश्यकता रही है। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना में राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

राष्ट्रीय विकास

पाठ्यक्रम का निर्माण उद्देश्यों पर आधारित होता है। उद्देश्यों की प्राप्ति करना ही। पाठ्यक्रम निर्माण की सफलता को निर्धारित करता है। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र को विकसित करना है। जो कि केवल शिक्षा द्वारा सम्भव है, राष्ट्रीय विकास उस अवस्था में सम्भव होता है, जब पाठ्यक्रम एवं शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता हो तथा एक उद्देश्य को ही प्राप्त करने का प्रयास किया जाये।

मानवीय मूल्यों का विकास

भारतीय दर्शन एवं शिक्षा मानवता एवं नैतिकता को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है। इसलिये पाठ्यक्रम का स्वरूप भी इस तथ्य से सम्बन्धित होगा। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 का प्रमुख उद्देश्य छात्रों में प्रारम्भिक स्तर से ही मानवीय मूल्यों का विकास करना है, जिससे कि छात्रों में प्रेम, सहयोग, दान, परोपकार एवं सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों का विकास किया जा सके।

संस्कृति का संरक्षण

भारतीय संस्कृति विश्व के लिए अनुकरणीय संस्कृति एवं आदर्श संस्कृति के रूप में देखी जाती है। विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति की प्रशंसा होती है, उस अक्षुण्ण संस्कृति का संरक्षण राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 का प्रमुख लक्ष्य रहा है। भारतीय संस्कृति में मानवीय नैतिक मूल्यों का प्रभुत्व रहा है। इन मूल्यों का संरक्षण इस पाठ्यक्रम में प्रस्तुत मूल्यों का प्रभुत्व रहा है। इन मूल्यों का संरक्षण एवं पाठ्यक्रम में प्रस्तुत विषयवस्तु के द्वारा होता है। प्रत्येक स्तर पर यह पाठ्यक्रम भारतीय संस्कृति में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का संरक्षण एवं विकास करता है।

छात्र में अध्ययन के प्रति रुचि का विकास

पाठ्यक्रम को स्तरानुकूल बनाया जाता है, जिससे कि प्रत्येक छात्र के द्वारा रुचि प्राप्त की जा सके। शिक्षण प्रक्रिया को रुचिपूर्ण व प्रभावपूर्ण बनाया जा सके। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 में छात्र में अध्ययन के प्रति रुचि का विकास किया जाना प्रमुख उद्देश्य है।

भाषायी समस्या का समाधान

भारतीय समाज में विभिन्न प्रान्तों में भाषा का स्वरूप भिन्न-भिन्न पाया जाता है। इससे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में भाषा की समस्या सदैव से रही है कि किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जाये। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम, 2005 में विभिन्न भाषाओं एवं मातृभाषा को उचित स्थान प्रदान कर भाषायी समस्या का समाधान किया है।

स्तरानुकूल शिक्षण विधियाँ

पाठ्यक्रम में स्तर के अनुकूल शिक्षण विधियों के प्रयोग की मान्यता प्रदान की है, जैसे प्राथमिक एवं पूर्व प्राथमिक स्तर पर सामान्य रूप से उन शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिये, जो कि खेल से सम्बन्धित हो तथा व्याख्यान व कथन विधि का प्रयोग माध्यमिक स्तर पर किया जाना चाहिये। अतः इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य शिक्षण विधियों का विकास करना है।

छात्रों का सर्वांगीण विकास

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का प्रभुत्व उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इस पाठ्यक्रम में छात्रों के क्रियात्मक पक्ष को बनाये रखने के लिये प्रायोगिक एवं सैद्धान्तिक पक्षों का समन्वय किया गया है। शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर प्रायोगिक कार्यों का स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है, जैसे प्राथमिक स्तर पर सृजनात्मक स्तर को कार्यानुभव का नाम दिया गया है तथा माध्यमिक स्तर पर इसकी प्रायोगिक कार्य के नाम से जाना जाता है। इस तरह से छात्र को क्रियात्मक एवं सैद्धान्तिक पक्ष दोनों दृष्टिकोण से सुदृढ़ बनाया जाता है।

प्रभावी शिक्षण का उद्देश्य

प्रभावशाली शिक्षण के लिए यह अति आवश्यक है कि पाठ्यक्रम का स्वरूप शिक्षा के अनुरूप हो। पाठ्यक्रम का निर्माण उपलब्ध संसाधनों एवं उनके प्रयोग की सम्भावनाओं पर विचार करके ही निर्मित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 में शिक्षकों में सशक्तिकरण करते हुए शिक्षण प्रक्रिया के लिए उपलब्ध भौतिक एवं मानवीय संसाधनों पर पूर्ण रूप से विचार किया गया। इसके पश्चात् राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी है। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रभावी शिक्षण का उद्देश्य राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का प्रमुख लक्ष्य है।

शिक्षकों में आत्मविश्वास का विकास करना

पाठ्यक्रम को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किये जाने के लिये शिक्षकों में आत्मविश्वास का विकास करना राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का उद्देश्य है। आत्मविश्वासपूर्ण शिक्षण कार्य निरन्तर प्रगति पर चलता है।

सामाजिक एकता का विकास

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में सामाजिक एकता से सम्बन्धित विषयवस्तु को समाहित कर सामाजिक एकता के विकास में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया है। सामाजिक एकता से आशय उस विकास से है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार, कर्त्तव्य एवं स्वस्थ सामाजिक परम्पराओं का पालन एवं संरक्षण करता हो, साथ ही सामाजिक विचारधाराओं में तारतम्य बनाये रखे।

शिक्षण साधनों में समन्वय स्थापित करना

यह पूर्णतया स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम के निर्माण से पूर्व उपलब्ध शैक्षिक संसाधनों पर विचार किया जाता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 का उद्देश्य शिक्षण कार्य के मानवीय एवं भौतिक साधनों में समन्वय स्थापित करना है। पाठ्यक्रम में इनके समन्वय को प्राथमिकता दी गयी है।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के उद्देश्य वास्तविक सन्दर्भों में स्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण है। इससे छात्रों के सर्वांगीण विकास सम्बन्धी सभी पक्षों को ध्यान में रखा गया है। अतः यह निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पाठ्यक्रम के उद्देश्य राष्ट्र, समाज, छात्र एवं शिक्षक सभी के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित किये गये हैं।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 की प्रमुख समस्याएँ
(Main Problems of National Curriculum Framework, 2005)

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के निर्माण में तथा इसके सफलतम क्रियान्वयन में अनेक प्रकार की बाधायें उत्पन्न हुई हैं, जिनका समाधान करना अनिवार्य है। पाठ्यक्रम के निर्माण करने तथा उसके क्रियान्वयन को पूर्णतः समस्याओं से रहित होना चाहिये, जिससे उसको क्रियान्वित करने वालों के समक्ष किसी भी प्रकार की समस्या न हो। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की संरचना एवं क्रियान्वयन सम्बन्धी प्रमुख समस्यायें निम्नलिखित हैं-

शिक्षक सम्बन्धी समस्याएँ

पाठ्यक्रम का निर्माण उचित शिक्षक संख्या के आधार पर किया जाता है, जबकि शिक्षक कम संख्या में होते हैं, जिससे पाठ्यक्रम का क्रियान्वयन उचित प्रकार से नहीं होता है। पाठ्यक्रम में प्रस्तुत अनेक बिन्दुओं पर शिक्षकों की संख्या सम्बन्धी समस्या उत्पन्न हो जाती है; जैसे छात्र को प्रारम्भ के दो वर्षों में मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। यह सुझाव राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 का है, परन्तु शिक्षकों की उपलब्धता जो कि विभिन्न भाषाओं का ज्ञान रखते हों, सम्भव नहीं है क्योंकि एक विद्यालय में भोजपुरी हिन्दी एवं उर्दू मातृभाषा के छात्र पाये जा सकते हैं। द्वितीय स्तर पर विद्यालयों की संख्या तो अधिक है परन्तु शिक्षकों की संख्या नगण्य है।

भाषाओं की समस्या

भाषा की समस्या राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के समय की उत्पन्न हुई कि शिक्षण का माध्यम कौन-सी भाषा हो? कौन-सी भाषा को पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान प्रदान किया जाये? भारतीय समाज में अनेक प्रकार की भाषाओं का प्रचलन होने के कारण भाषाओं ने विवाद की स्थिति उत्पन्न कर दी है। प्रत्येक राज्य अपनी भाषा की उपेक्षा का दोष लगाना आरम्भ कर देता है कि उसकी भाषा को पाठ्यक्रम में उचित स्थान प्रदान नहीं किया जा रहा है। भाषा विवाद की जो स्थिति प्रारम्भ में थी, वही समस्या आज भी विद्यमान है।

धर्म सम्बन्धी समस्याएँ

धर्म सम्बन्धी समस्या राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 की प्रमुख समस्या रही। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की संरचना करते समय धन की सीमितता को ध्यान में रखना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप पाठ्यक्रम में उन विषयों का समावेश नहीं हो पाता है जिनकी आवश्यकता अनुभव की जाती है, जैसे वर्तमान समय में कम्प्यूटर की सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही प्रदान करनी चाहिये। इसके लिये विद्यालयों में कम्प्यूटर की व्यवस्था होनी चाहिये, परन्तु धनाभाव के कारण यह सम्भव नहीं हो पाता है।

संसाधनों का अभाव

भारत एक विशाल देश होने के कारण संसाधनों का अभाव पाया जाना स्वाभाविक है। संसाधनों के अभाव में महत्त्वपूर्ण विचार-विमर्श न होने के कारण संसाधनों का अभाव पाठ्यक्रम संरचना में एक प्रमुख बाधा है।

वैश्वीकरण का प्रभाव

वैश्वीकरण का नकारात्मक प्रभाव भी पाठ्यक्रम संरचना की एक प्रमुख समस्या है। वैश्वीकरण के कारण प्रत्येक देश के पाठ्यक्रम शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा दर्शन एवं उद्देश्यों का ज्ञान दिया जाता है। अतः भारत के पाठ्यक्रम निर्माता भी विश्वस्तरीय पाठ्यक्रम निर्माण करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। संसाधन एवं विस्तृत सोच के अभाव के कारण पाठ्यक्रम का स्वरूप विश्व स्तर पर श्रेष्ठ गणना में नहीं आ पाता है।

राजनैतिक समस्याएँ

राजनैतिक समस्यायें पाठ्यक्रम निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है। लोकतान्त्रिक देश होने के कारण सरकारों के परिवर्तन का क्रम चलता रहता है। सरकार में पदासीन व्यक्तियों की मनोदशा का पाठ्यक्रम निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। अभी कुछ समय पूर्व पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा के अध्याय का समावेश किया गया है, जिसका अन्य संगठनों के द्वारा कड़ा विरोध किया गया। इसके परिणामस्वरूप यह अध्याय पाठ्यक्रम से पृथक् करना पड़ा। अतः इस प्रकार से पाठ्यक्रम का परिमार्जित एवं पारदर्शी स्वरूप विकसित नहीं हो पाता।

क्रियान्वयन एवं निर्णय की समस्या

यदि पाठ्यक्रम का क्रियान्वयन उचित रूप में नहीं होता है तो निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति भी सम्भव नहीं होती है। पाठ्यक्रम में प्रस्तुत सुझावों के क्रियान्वयन की समस्या भी एक प्रमुख समस्या है। पाठ्यक्रम में विषयवस्तु एवं प्रकरणों को स्थान प्रदान करने में एक समिति को निर्णय लेना पड़ता है। इस निर्णय की प्रक्रिया में विचार एवं सोच की विविधता के कारण अनावश्यक विलम्ब होता है।

अतः उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के समक्ष अनेक प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुई हैं, जिन्होंने पाठ्यक्रम को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा सम्बन्धी समस्याओं का समाधान

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का क्रम सन् 1988 से अनवरत रूप से प्रारम्भ है जिसमें राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2000 तथा राष्ट्रीय संरचना सन् 2005 प्रस्तुत किये जा चुके हैं। पाठ्यक्रम संरचना सम्बन्धी समस्याओं को निम्नलिखित रूप में समाप्त किया जा सकता है-

1. शिक्षकों में आत्मविश्वास की भावना का विकास करते हुए कर्तव्य पालन के दृष्टिकोण को विकसित करना चाहिये।

2. समाज के व्यक्तियों में कार्य के प्रति निष्ठा की भावना जाग्रत की जानी चाहिये। किसी भी पद एवं गौरव की इच्छा को सामान्य रूप में प्रदर्शित करने की योग्यता विकसित करनी चाहिये।

3. भाषा सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिये कोई एक सूत्रीय व्यवस्था को निरूपित करना चाहिये जिसमें किसी को भी आपत्ति न हो।

4. भारतीय समाज में विकसित दृष्टिकोण का समावेश करते हुए आधुनिक विचारधाराओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न करना चाहिये।

5. पाठ्यक्रम निर्माताओं को उपलब्ध संसाधनों में ही श्रेष्ठतम पाठ्यक्रम का स्वरूप निर्मित करना चाहिये। इसके लिये पाठ्यक्रम निर्माण समिति में अनुभवी व योग्य व्यक्तियों को स्थान प्रदान करना चाहिये।

6. शिक्षा को राजनैतिक दोषों से दूर रखने के लिये राजनीतिज्ञों में जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिये जिससे वे शिक्षा के विकास पर ही ध्यान दें।

7. धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर मानव कल्याण एवं मानव विकास की भावना का समावेश जनसामान्य में करना चाहिये।

8. सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में अधिक मात्रा में धन उपलब्ध कराना चाहिये क्योंकि शिक्षा द्वारा ही राष्ट्र एवं समाज का उत्थान होता है।

उपर्युक्त सुझावों के आधार पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा को नवीन आधार प्राप्त होगा तथा पाठ्यक्रम निर्माण में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न नहीं होगी। पाठ्यक्रम निर्माण स्वयं में एक बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य होता है। यह कार्य बाधारहित एवं स्वस्थ वातावरण में सम्पन्न करना चाहिये।

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