पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त (Principles of Curriculum Construction)

पाठ्यक्रम किन सिद्धान्तों के आधार पर निर्मित किया जाये, इसके विषय में विद्वानों ने विस्तार से विचार किया है। कुछ विद्वानों ने इसके सामाजिक आधार को अधिक महत्व दिया है तो कुछ विद्वानों ने मनोवैज्ञानिक आधार को अत्यधिक आवश्यक बताया है। पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त (Principles of Curriculum Construction) को निम्नलिखित ढंग से व्यक्त किया जा सकता है-

बच्चों की आवश्यकता एवं रुचियों का ध्यान (Attention of the Children’s Need and Interests)

पूर्व में विद्वान पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय विषय के तार्किक क्रम को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे। वे जब विभिन्न स्तरों के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण करते थे तो देखते थे कि विषयों का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह पढ़ाना चाहिए, उसके पश्चात् अमुक सामग्री का अध्ययन करना चाहिए। इस प्रकार के पाठ्यक्रम में विद्यार्थी की क्षमता का ध्यान नहीं रखा जाता था।

विद्यार्थी किसी बात को सीखने के लिए किसी समय अधिक जिज्ञासु रहता है। आवश्यकता इस बात की है कि विद्यार्थी की इस जिज्ञासा का लाभ उठाया जाये। यह देखा जाये कि बालक अमुक वस्तु में अधिक रुचि लेते हैं तो उसी के आधार पर पाठ्यक्रम में सुन्दर सामग्री का संकलन किया जाये। बालक की क्षमता, आवश्यकता एवं रुचि का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है। मनोवैज्ञानिक इस सिद्धान्त को महत्वपूर्ण सिद्धान्त मानते हैं ।

पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त (Principles of Curriculum Construction)
पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त (Principles of Curriculum Construction)

सामाजिक आवश्यकता का ध्यान (Attention to the Social Need)

बालक की आवश्यकता के साथ-साथ समाज की आवश्यकता का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बालक का विकास शून्य में नहीं होता । बालक की क्षमताओं के विकास के लिए एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी समाज का ध्यान रखना आवश्यक होगा। देश के माध्यमिक विद्यालयों में स्वतन्त्रता से पहले इंग्लैण्ड के इतिहास एवं अंग्रेजों के अध्ययन पर बल दिया जाता था।

समाज की आवश्यकता के कारण ऐसा नहीं था, वरन् अंग्रेजी सरकार की मशीनरी को चलाने की आवश्यकता की पूर्ति के लिए ऐसा किया जाता था। समाजशास्त्री इस सिद्धान्त को अत्यधिक आवश्यक सिद्धान्त मानते हैं ।

उपयोगिता का सिद्धान्त (Principle of Utility)

उपर्युक्त दोनों सिद्धान्तों की कुंजी के रूप में यह तीसरा सिद्धान्त है। यह बहुत स्पष्ट सिद्धान्त है कि पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय विशेष ज्ञान या तार्किक क्रम को आधार न मानकर उपयोगिता को ही आधार माने।

जो कुछ व्यक्ति एवं समाज के लिए उपयोगी है, उसे पाठ्यक्रम में स्थान मिले, जो अनुपयोगी है वह कितनी भी महत्त्वपूर्ण सामग्री क्यों न हो, उसे पृथक् ही रखा जाये। इस तीसरे सिद्धान्त में प्रथम दो सिद्धान्तों की पूर्ण अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। नन महोदय ने इस सिद्धान्त को सबसे श्रेष्ठ सिद्धान्त माना है।

रचनात्मकता का सिद्धान्त (Principle of Creativity)

प्रत्येक बालक में कुछ-न-कुछ रचनात्मक शक्ति ईश्वर-प्रदत्त होती है। पाठ्यक्रम को इस प्रकार का बनाना चाहिए कि वह विद्यार्थियों को रचनात्मक कार्यों का अवसर प्रदान कर सके। यदि बालक की रचनात्मक शक्ति के व्यक्त होने का अवसर नहीं मिलेगा तो उसका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सकेगा।

बालक को सृजनात्मक कार्यों की प्रेरणा मिलनी चाहिए और कलात्मक रचना की गुप्त शक्तियों के विकास का अवसर मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त का समर्थन सबसे अधिक रेमॉण्ट महोदय ने किया है।

खेल तथा कार्य में समन्वय (Synthesis between Work and Play)

खेल में तात्कालिक आनन्द उद्देश्य होता है, जबकि कार्य में सुदूर प्रयोजन निहित होता है। इसीलिए पहले के समय में कहा जाता है कि “खेलने के समय खेलो और काम करने के समय काम करो।” बालक खेल में अत्यधिक आनन्द को अनुभव करता है।

खेल और कार्य एक नहीं हो सकते, किन्तु खेल और कार्य सम्बन्धी क्रियाओं में यदि कुछ सम्बन्ध स्थापित हो सकें तो इससे व्यक्तित्व का विकास शीघ्र होता है। सीखना एक ऐसा कार्य है जिसमें खेल की क्रियाओं से सहायता प्राप्त हो सकती है।

खेल विधि द्वारा अध्ययन अधिक रुचिकर हो सकता है। खेल पद्धति से सीखी हुई बात अधिक आनन्ददायी एवं स्थायी हो सकती है। अत: जहाँ तक सम्भव हो, खेल और कार्य में समन्वय स्थापित किया जाये, किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि खेल से सम्बन्धित करने के लोभ में कार्य के प्रयोजन को ही भुला दिया जाये।

मॉण्टेसरी स्कूल तथा किण्डरगार्टन स्कूल में खेल तथा कार्य में पर्याप्त समन्वय दिखाई पड़ता है। पाठ्यक्रम में खेल तथा कार्य के अवसर प्रदान किये जायें और सम्भव हो तो दोनों में समन्वय की शिक्षा भी इंगित की जाये।

व्यवहार के आदर्शों की प्राप्ति का सिद्धान्त (Principle of Realisation of Ideals of Behaviour)

मानव जीवन का लक्ष्य है—सुन्दर एवं स्वास्थ्य जीवन-यापन करना। स्वास्थ्य जीवन के लिए स्वास्थ्य व्यवहार आवश्यक है। स्वास्थ्य व्यवहार किस प्रकार हो, इसका निर्णय संस्कृति करती है। स्वस्थ व्यवहार के इन प्रतिमानों तक बालक को पहुँचना होता है। पाठ्यक्रम में इस प्रकार की सामग्री का चयन हो कि बालक व्यवहार के आदर्शों का ज्ञान प्राप्त कर सके।

साथ ही पाठ्यक्रम को इस प्रकार के अवसर भी प्रदान करने चाहिए कि बालक उन आदर्शों तक पहुँचने का प्रयत्न कर सके। इस प्रकार के पाठ्यक्रम में जीवन सम्बन्धी समस्त क्रियाओं को सम्मिलित किया जाना चाहिए। बालक के स्वास्थ्य, मनन, बौद्धिक विकास, कौशल आदि की उन्नति के लिए अवसर मिलने चाहिए।

विकास का सिद्धान्त (Principle of Development)

पाठ्यक्रम में विद्यालय के समस्त अनुभव सम्मिलित रहते हैं। विद्यालय समाज की आवश्यकताओं का ध्यान रखता है। पाठ्यक्रम के निर्माण में भी समाज की आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। समाज स्थिर नहीं होता है, इसका विकास होता रहता है।

पाठ्यक्रम को भी स्थिर नहीं होना चाहिए। विकास इसका भी आवश्यक सिद्धान्त है। यथासम्भव आवश्यकतानुसार परिवर्तन होना चाहिए। इसका निर्माण इस प्रकार से किया जाये कि विकास की सम्भावना बनी रहे। क्रो एण्ड क्रो ने विकास के सिद्धान्त का पर्याप्त समर्थन किया है।

लचीलेपन का सिद्धान्त (Principle of Flexibility)

पाठ्यक्रम में लचीलापन भी पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए, जिससे इसमें समय-समय पर महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक चीजों को सम्मिलित किया एवं हटाया जा सके। यदि पाठ्यक्रम लचीला नहीं होगा तो समय के साथ वह नीरस एवं अनुपयोगी होता चला जायेगा। अतः पाठ्यक्रम को पर्याप्त लचीलेपन को अपने आप में बनाये रखना चाहिए।

इस प्रकार पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त में उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखा जाता है।

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