दर्शन का विषय क्षेत्र (तत्वमीमांसा, ज्ञान मीमांसा, मूल्य मीमांसा)

दर्शन का विषय क्षेत्र (Scope of Philosophy)

भारतीय विचारधारा में दर्शन तथा जीवन में किसी प्रकार का अन्तर नहीं समझा जाता बल्कि सम्पूर्ण जीवन को ही दर्शन का विषय क्षेत्र माना जाता है।
दर्शन के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है-

तत्व मीमांसा (Metaphysics)

“तत्वमीमांसा में आत्मा, जगत और परमात्मा का अध्ययन किया जाता है। तत्वमीमांसा के क्षेत्र में सद् वस्तु का ज्ञान, आत्मा का दर्शन और सृष्टिशास्त्र को भी सम्मिलित किया जाता है। 

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित का अध्ययन किया जाता है-

अस्तित्व की प्रकृति क्या है?
सत्य क्या है?
उसके विभिन्न रूप क्या है?
विश्व एक है अथवा अनेक हैं?
काल तथा आकाश क्या है?
द्रव्य क्या है?
कार्यकारण क्या है?
तथ्य क्या है?
प्रयोजन और लक्ष्य क्या हैं?
परिवर्तन क्या है?
नवीनता किसे कहते हैं?
समानता किसे कहते हैं?
मैं कौन हूँ?
क्या जगत ने प्रगति की है? इत्यादि।

तत्व मीमांसा के प्रकार (Types of Metaphysics)

1. आत्म-सम्बन्धी तत्व ज्ञान (Metaphysics of soul)
2. ईश्वर सम्बन्धी तत्व ज्ञान (Theology)
3. सत्ताशास्त्र (Ontology)
4. सृष्टिशास्त्र (Cosmology)
5. सृष्टि उत्तपत्ति का शास्त्र (Cosmogony)

ईश्वर सम्बन्धी तत्व ज्ञान (Theology)- यह दार्शनिक विचारधारा ईश्वर सम्बन्धी प्रश्नों तथा समस्याओं से सम्बन्धित है। ईश्वर विज्ञान की विचारधारा ईश्वर को ही अन्तिम सत्य मानती है। ‘ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या‘ ईश्वर से सम्बन्धित प्रश्नों की मीमांसा तीन प्रकार से की जाती है-

ऐकेश्वरवाद (Monothesim)
द्वैतेश्वरवाद (Dithesim)
अनेकेश्वरवाद (Polythesim)

ईश्वर को सत्य मानने वाली भी तीन प्रकार की विचारधाराएँ हैं। कुछ का विश्वास है कि ईश्वर एक है, कुछ दो ईश्वर तथा अन्य ईश्वर के अनेक रूप मानते हैं। द्वैतेश्वरवाद-आत्मा परमात्मा दोनों को सत्य मानते है। सभी जीवों को आत्मा ईश्वर का स्वरूप है अथवा जो ईश्वर को कई रूपों में मानते हैं उन अनेकेश्वरवाद कहते हैं।
ईश्वर तथा विश्व के सम्बन्ध की मीमांसा चार प्रकार से की गई है-

(1) तटस्थ-ईश्वरवाद (Deism),
(2) सर्वेश्वरवाद (Pantheism),
(3) ईश्वरवाद (Theism),
(4) आंतरातीत-ईश्वरवाद (Panetheism)

सत्ताशास्त्र (Ontology)- इसके अन्तर्गत किसी द्रव्य (Substance) को ही सत्य मानते है। प्रकृति एवं संसार द्रव्य से बना है। प्रकृतिवाद के अन्तर्गत द्रव्य को सत्य मानते हैं। प्रकृतिवाद तत्वमीमांसा का दर्शन है। इसके अनुसार तत्व विज्ञान के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं-
1. इसके अनुसार द्रव्य (Substance) मूल सत्य है।
2. बाह्य ऊर्जा से द्रव्य में परिवर्तन होता है।
3. तत्व विज्ञान ही प्रकृतिवाद है।
4. तत्व विज्ञान को भौतिकवाद भी कहते हैं।
5. यह ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करता है।
6. यह वैज्ञानिक, अनुभव, ज्ञानइन्द्रिय तथा यथार्थ को महत्त्व देता है।
7. यह नैतिक मूल्यों को महत्त्व नहीं देता, अपितु सांसारिक पदार्थों एवं क्रियाओं तक सीमित है।
तत्व विज्ञान के कुछ विशिष्ट सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है-

(i) भौतिकवाद
(ii) अध्यात्मवाद
(iii) द्वैतवाद
(iv) तटस्थवाद
(v) निरपेक्षवाद
(vi) अनेकत्ववाद
(vii) एकत्ववाद

सृष्टिशास्त्र (Cosmology)- विश्व से सम्बन्धित समस्यायें ही सत्य या यथार्थ है। इसका सम्बन्ध विकासवाद से अधिक है। विश्व की उत्पत्ति से सम्बन्धित प्रश्न विश्व विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र है। विश्व विज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ तथा लक्षण इस प्रकार हैं-

1. विश्व की उत्पत्ति प्रकृति ने की है।
2. ईश्वर ने इस दृष्टि की रचना की है।
3. ईश्वर अनन्त तथा सर्वव्यापी है।
4. ईश्वर ने सभी गुणों को बनाया, परन्तु उनमें कोई क्रम नहीं है।
5. विश्व में जीवों में अधिक विषमता है, जो विश्व की विविधता को प्रकट करते हैं।
6. विश्व के जीवों में लिंग का भेद रहता है, जो सर्वव्यापक है।
7. विश्व की उत्पत्ति के बाद से कोई परिवर्तन नहीं हुआ मूल रूप में विश्व वैसा ही है।

सृष्टिवाद तथा विकासवाद,  
डार्विन सिद्धांत

तत्वमीमांसा की विशेषताएं (Characteristics of Metaphysics)

  • तत्व मीमांसा का विवेच्य पदार्थ सत् है।
  • जगत में प्रकृति स्वयं प्राणियों के समक्ष सत्य तथा प्रातीतिक सत्य पदार्थों को प्रस्तुत करती है।
  • तत्व मीमांसा प्रतीति से सत् को पृथक करती है।
    साधारण अर्थ में तत्व मीमांसा वह है जो भौतिक संसार से परे है।
  • तत्व मीमांसा में सत्य की खोज की जाती है।
  • तत्व मीमांसा यथार्थ की प्रकृति की समस्या का समाधान खोजता है।
  • तत्व मीमांसा मूलत: मनुष्य, जगत्, ईश्वर और परलोक से सम्बन्धित है।
  • इसके अन्तर्गत ईश्वर के अस्तित्व, ईश्वरीय सत्ता, जीव और आत्मा का अस्तित्व, जगत का स्वरूप, जगत का आदि और अन्त एवं जीवन-मरण आदि का अध्ययन किया है।

ज्ञान मीमांसा (Epistemology)

“आदर्शवाद चेतना को ज्ञान की संज्ञा देता है, जो ज्ञानेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से परे अनुभूतियों से सम्बन्धित है, जबकि प्रयोजनवाद और प्रकृतिवाद ज्ञानेन्द्रियों के प्रत्यक्षीकरण को ही ज्ञान मानते हैं।”

दर्शन का यह दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। ज्ञानमीमांसा दर्शन की वह शाखा है जिसमें ज्ञान सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जाता है। उनकी प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार हैं-

ज्ञान क्या है?
ज्ञाता और ज्ञेय में क्या सम्बन्ध है?
क्या ज्ञान को अन्तर्वस्तु बाह्य वस्तु है या वह उससे भिन्न है?
हम यह कैसे जान सकते हैं कि हमारा ज्ञान वस्तु का यथार्थ ज्ञान है?
क्या यथार्थ का ज्ञान सम्भव है?
ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं?
ज्ञान के स्रोत क्या है?
ज्ञान की प्रक्रिया क्या है?
ज्ञान का क्या स्वरूप है?
क्या ज्ञाता का ज्ञान सम्भव है यदि नहीं तो क्या जाना जाता है?
यदि ज्ञेय एक वस्तु है तो यह वस्तु क्या है?
क्या किसी वस्तु को जाने बिना उसके अस्तित्व का ज्ञान हो सकता है?
हम सत्य और असत्य ज्ञान में कैसे अन्तर कर सकते हैं?
अज्ञान क्या है?
क्या वह ज्ञान का ही एक रूप है अथवा उससे भिन्न है?
ज्ञान की प्रक्रिया क्या है?
क्या अज्ञेय ऐसी वस्तु है जो ज्ञान से पूर्व ही उपस्थित थी?
ज्ञान के विस्मरण का क्या है?
ज्ञान की प्रमाणिकता का क्या आधार है?
ज्ञान की प्रक्रिया में कौन सी भूलें सम्भव हैं?
क्या हमारा ज्ञान निश्चित है अथवा केवल अनुभूति और आस्था से हम उसे निश्चित मानते है?
कुछ विश्वासों को अन्य विश्वासों से अधिक प्रामाणिक क्यों माना जाता है?
कितने प्रकार का ज्ञान उपलब्ध है?
ज्ञान के विभिन्न प्रकारों में क्या अन्तर है?
ज्ञान प्राप्त करने के उपकरण कौन से है?
ज्ञान का विज्ञान और दर्शन से क्या सम्बन्ध है? इत्यादि।
सत्यता की परीक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त क्या हैं?

ज्ञान मीमांसा की विशेषताएं (Characteristics of Epistemology)

  • ज्ञान मीमांसा को प्रमाण मीमांसा भी कहा जाता है।
  • ज्ञान मीमांसा सत्य सम्बन्धी ज्ञान का विकास करता है।
  • ज्ञान मीमांसा के अन्तर्गत मानव बुद्धि, ज्ञान का स्वरूप, ज्ञान की सीमा ज्ञान की प्रामाणिकता, ज्ञानगम्यता, ज्ञानातीतता, ज्ञान प्राप्त करने के साधन, ज्ञान प्राप्त करने की विधियाँ, तर्क की विधियाँ, सत्य-असत्य प्रमाण और भ्रम की व्याख्या आदि को सम्मिलित किया जाता है।
  • जो पदार्थ अपनी सत्ता के लिए अनुभव पर आधारित रहते हैं उन्हें अनुभवजन्य कहते है।
  • जो पदार्थ अपनी सत्ता के लिए अनुभव से स्वतन्त्र रहते हैं उन्हें अनुभवाजन्य कहते हैं।
  • ज्ञान मीमांसा आगमन और निगमन तथा विश्लेषण एवं संश्लेषण विधियों का उपयोग करता है।

मूल्य मीमांसा (Axiology)

मूल्य मीमांसा के प्रकार ( Types of Axiology)

आचार मीमांसा (Ethics)
तर्कशास्त्र (Logic)
सौन्दर्य मीमांसा (Aesthetics)

आचार मीमांसा (Ethics)

  • आचार मीमांसा का प्रधान विषय आचार या कर्त्तव्य की मीमांसा है।
  • इसमें जीवन का ध्येय क्या है? सुख की प्राप्ति या कल्याण की उपलब्धि कैसे होती है? कर्त्तव्य किसे कहते हैं ? कर्त्तव्य का निर्णय किस आधार पर किया जाता है ? आदि का अध्ययन करते हैं।

तर्कशास्त्र (Logic)

  • तर्कशास्त्र में तर्क को सत्य तथा प्रामाणिक सिद्ध करने के नियमों का यथार्थ तथा विशद् वर्णन किया जाता है।
  • इसके दो विभाग है- निगमन तथा आगमन

सौन्दर्य मीमांसा (Aesthetics)

  • इसमें सौन्दर्य निर्णय, व्यावहारिक सौन्दर्य का अध्ययन किया जाता है।
  • सौन्दर्य निर्णय में सुन्दरता की सात्विक व्याख्या की जाती है।

मूल्य मीमांसा की विशेषताएं ( Characteristics of Axiology)

  • मूल्य मीमांसा ज्ञान के चयन के लिए आधार प्रदान करती है।
  • मूल्य मीमांसा का सम्बन्ध जीवन की सत्यता से होता है।
  • मूल्य मीमांसा में मानव जीवन के आदर्श एवं मूल्यों की विवेचना के साथ मानव जीवन के अन्तिम उद्देश्य को प्राप्त करने के साधनों की विवेचना की जाती है।

आशा करते हैं कि यह लेख दर्शन का विषय क्षेत्र (तत्वमीमांसा, ज्ञान मीमांसा, मूल्य मीमांसा) आपके ज्ञान में वृद्धि करेगा।

Leave a Comment

error: Content is protected !!