मनोविज्ञान का क्षेत्र (Scope of Psychology)

मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है, क्योंकि जहाँ व्यवहार है वहीं मनोविज्ञान है। व्यवहार और कार्य के अनुसार मनोविज्ञान को अनेक क्षेत्रों में बाँटा गया है। प्रत्येक क्षेत्र का अपना अलग उद्देश्य है। मनोविज्ञान उन जीवविज्ञानों में से एक है जिनमें जीव के किसी-न-किसी पक्ष का अध्ययन करते हैं। मनोविज्ञान के अन्तर्गत किसी-न-किसी वातावरण में प्राणी के व्यवहार और अनुभूतियों का अध्ययन होता है तथा उसे समझने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार मनोविज्ञान का क्षेत्र उतना ही विस्तृत है जितना जीवन का क्षेत्र है। मनोविज्ञान बालक, किशोर, प्रौढ़, सामान्य और असामान्य व्यक्तियों का, मनुष्यों और पशुओं का तुलनात्मक अध्ययन करता है। मनुष्य केवल जैविकीय प्राणी नहीं अपितु सामाजिक प्राणी भी है इसलिए उसका व्यवहार समाज के अन्य सदस्यों मनोविज्ञानद्वारा प्रभावित होता है। चूँकि इस प्रक्रिया में प्राणी अनेक प्रकार की क्रियायें करता है, ये क्रियायें मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की होती हैं जिन्हें अनुभूति और व्यवहार कहा जाता है। संवेदन, प्रत्यक्षीकरण, चिन्तन, तर्क, अवधान, रुचि, स्मरण- विस्मरण, संवेग, कल्पना आदि सभी प्रकार की मानसिक क्रियाओं का अध्ययन मनोविज्ञान के अन्तर्गत होता है। अतः कहा जा सकता कि मनोविज्ञान वातावरण से उत्पन्न प्राणी के व्यवहार का अध्ययन करता है। मानव को अपने जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न अवस्था में व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन करने के कारण मनोविज्ञान की बहुत-सी शाखाएँ हो गयी हैं। मनोविज्ञान का क्षेत्र इन शाखाओं के विषय-क्षेत्र से मिलकर बना है जिनमें मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की शाखाओं और उन शाखाओं के अध्ययन क्षेत्र को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है-

मनोविज्ञान का क्षेत्र
मनोविज्ञान का क्षेत्र

Table of Contents

साधारण मनोविज्ञान (Normal Psychology)

इसमें साधारण व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन साधारण परिस्थितियों में किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में सामान्य पुरुष जिस प्रकार का आचरण करते हैं, उसका अध्ययन इस शाखा में किया जाता है। संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, कल्पना, चिन्तन आदि मानसिक प्रक्रियाओं का इसमें अध्ययन किया जाता है। इस शाखा में मनोविज्ञान के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है। किसी भी विज्ञान का अध्ययन करने में सबसे पहले उस विज्ञान के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन आवश्यक है। इससे उस विज्ञान में प्रयुक्त सभी पारिभाषिक शब्द स्पष्ट हो जाते हैं, साथ ही उन सिद्धान्तों से भी परिचय हो जाता है जिनके आधार पर वह आगे का ज्ञान अर्जित करेगा। अतः सामान्य मनोविज्ञान अन्य सभी शाखाओं का जमक है।

असाधारण मनोविज्ञान (Abnormal Psychology)

असाधारण मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानव-मन की असाधारण अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें वातोन्माद (Hysteria), आतंक (Phobia), भ्रान्ति, विस्मरण आदि अनेक स्नायु रोगों का विशेष रूप से अध्ययन होता है। इन रोगों का इलाज करके इनके उपचार पर शोध कार्य किया जाता है। इस प्रकार असाधारण मनोविज्ञान में मनोविकृतियों, मन की असाधारण अवस्थाओं, भावना- ग्रन्थियों, मानसिक रोगों, दिवास्वप्न आदि का अध्ययन किया जाता है।

विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology)

मनोविज्ञान की इस शाखा में गर्भाधान की क्रिया (Conception) से प्रारम्भ कर, बालक के जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली सभी प्रकार की वृद्धि और विकास का क्रमबद्ध अध्ययन करने का कार्य किया जाता है। विकास के किस स्तर पर व्यक्ति के विभिन्न पक्षों या व्यवहार जन्य क्रियाओं का क्या रूप होता है, इस बात की सामान्य जानकारी प्रदान करना ही इस शाखा का प्रमुख उद्देश्य होता है।

दैहिक मनोविज्ञान (Physiological Psychology)

व्यवहारात्मक स्नायुविज्ञान (behavioral neuroscience) की शाखा है जिसमें प्रत्यक्षण (perception) और व्यवहार के लिए उत्तरदायी तंत्रिकीय क्रियाविधियों (न्यूरल मेकेनिज्म्स) का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए गैर-मानवी प्राणियों पर नियंत्रित प्रयोग किए जाते हैं जिनमें उनके मस्तिष्कों को सीधे जोड़-तोड़ (मैनिपुलेट) किया जाता है। इसे कभी-कभी मनोदैहिकी (psychophysiology) भी कहते हैं। हाल के दिनों में इसे संज्ञानात्मक तंत्रिकाविज्ञान (cognitive neuroscience) भी कहा गया है।

बाल मनोविज्ञान (Child Psychology)

यह मनोविज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के अन्तर्गत बालकों के व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। शैशवावस्था में पालन-पोषण, लाड़-प्यार आदि में त्रुटि होने से बालकों में अनेक प्रकार की भावना-ग्रन्थियाँ बन जाती हैं जो आगे चलकर उनके व्यवहार को असाधारण बना देती हैं। इसी से मानव जीवन में शैशवावस्था का बड़ा महत्व है और बच्चों के प्रति अभिभावकों के लिए सावधानी अपेक्षित होती है। बाल्यावस्था में बालक का जिस प्रकार विकास होता है उसका उसके व्यक्तित्व पर अमिट प्रभाव पड़ जाता है। इस कारण बाल मनोविज्ञान का ज्ञान अध्यापकों, अभिभावकों तथा समाजसेवियों के लिए बहुत आवश्यक होता है। इस प्रकार बालकों का सन्तुलित विकास कैसे होता है, इसका अध्ययन हम इसमें कर सकते हैं।

किशोर-मनोविज्ञान (Adolescent Psychology)

किशोरावस्था भी व्यक्ति के विकास में बहुत योगदान करती है। मनोविज्ञान की इस शाखा में 12 वर्ष से 18 वर्ष की अवस्था तक के किशोरों का अध्ययन होता है। यह अवस्था व्यक्ति के विकास में बड़ी महत्वपूर्ण होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति में शारीरिक, संवेगात्मक, सामाजिक तथा बौद्धिक विकास से सम्बन्धित अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों से उसे अपार शक्ति का अनुभव होता है। अकसर किशोर इन शक्तियों के तूफान में पड़कर नियन्त्रण एवं व्यवस्थापन खो बैठता है। इसी अवस्था में अनुशासनहीनता, घर से भागने की प्रवृत्ति, माँ- बाप से विद्रोह, सत्ता के प्रति विद्रोह, काम-वासना आदि अनेक प्रवृत्तियाँ उदय होती हैं। किशोर मनोविज्ञान में इन प्रवृत्तियों तथा किशोर की मनोदैहिक आवश्यकताओं का अध्ययन किया जाता है। किशोर के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास की जानकारी इसी शाखा के अन्तर्गत प्राप्त कर सकते हैं।

प्रौढ़ मनोविज्ञान (Adult Psychology)

प्रौढ़ों की व्यवहार सम्बन्धी समस्याओं, उनमें विकास एवं वृद्धि सम्बन्धी विशेषताओं, समायोजन सम्बन्धी कठिनाइयों आदि का अध्ययन किया जाता है।

वैयक्तिक मनोविज्ञान (Individual Psychology)

मानव एक सामाजिक प्राणी होते हुए भी कई अर्थों में एक-दूसरे से भिन्न है। सामाजिक, संवेगात्मक, शारीरिक तथा बौद्धिक विकास की दृष्टि से मानव एक-दूसरे से भिन्न होता है। उसकी अपनी आवश्यकताएँ, विशेषताएँ एवं विलक्षणताएँ होती हैं। इन सभी व्यक्तिगत विशेषताओं एवं भिन्नताओं का अध्ययन वैयक्तिक मनोविज्ञान में किया जाता है। प्रत्येक छात्र की आवश्यकताओं, उपलब्धियों, दुर्बलताओं, रुचियों, व्यवहारों को समझने तथा निदान करने के लिए शिक्षक व माता-पिता को भी इसका ज्ञान आवश्यक रूप से होना चाहिए।

संज्ञानात्मक मनोविज्ञान (Cognitive Psychology)

मनोविज्ञान की यह शाखा व्यवहार के अध्ययन में संज्ञाना विकास तथा प्रक्रियाओं को अधिक महत्त्व देती है। मनोविज्ञान की इस शाखा से जुड़े हुए मनोवैज्ञानिक व्यवहार को उद्दीपन-अनुक्रिया (Stimulus Response) जैसी यन्त्र चलित क्रिया नहीं मानते और न इसे आदत (Habitasan अनुबन्धन Conditioning) के प्रतिफल के रूप में स्वीकार करते हैं बल्कि इसे पूरी तरह सोची-समझी ज्ञानात्मक सक्रिया का परिणाम मानते हैं। उनकी दृष्टि में मानव व्यवहार में मस्तिष्क की विकसित शक्तियों, अनुभव, विवेक तथा अन्तःदृष्टि (Insight) का उपभोग होता है तथा इन्हीं के आधार पर निर्णय क्षमता तथा समस्या समाधान योग्यता सम्बनी सज्ञानात्मक व्यवहार के दर्शन मानव व्यवहार में देखने को मिलते हैं। इस प्रकार की व्यवहारजनित बातों का अध्ययन ही संज्ञानात्मक मनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य होता है।

सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology)

व्यक्ति एकान्त में जिस प्रकार का व्यवहार करता है, समूह में वह उसी प्रकार व्यवहार नहीं करता है। समाज का अपना एकअलग व्यवहार होता है। व्यक्ति का व्यक्तिगत व्यवहार उसके सामाजिक अथवा समूह के व्यवहार से भिन्न होता है। किसी भी समूह में जब वह होता है, तो अनुकरण, निर्देश, सहानुभूति तथा सामाजिक प्रवृत्तियाँ उसके व्यवहार को प्रभावित कर देती हैं और वह समूह के अनुसार ही व्यवहार करने लगता है। समाज का सदस्य होने के समय वह अपने व्यक्तित्व को भूल जाता है। नेताओं, वक्ताओं, समाज-सुधारकों, सेनापतियों आदि के लिए समाज मनोविज्ञान का ज्ञान उपयोगी होता है। समूह को वे अपने आवश्यकतानुसार जैसा चाहते हैं, वैसा मोड़ देते हैं। विद्यालय भी एक समाज है। छात्र कक्षा में, प्रार्थना सभा में, पुस्तकालय एवं वाचनालय में, सांस्कृतिक स्थलों में, समूह जैसा व्यवहार करता है। अतः अध्यापक को भी इस मनोविज्ञान के ज्ञान की बड़ी आवश्यकता होती है। समाज का मन प्रचार, विज्ञापन आदि से प्रभावित रहता है। इन सबका इस मनोविज्ञान में अध्ययन किया जाता है।

प्रयोगात्मक मनोविज्ञान (Experimental Psychology)

सामान्य मनोविज्ञान जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है, प्रयोगात्मक मनोविज्ञान उन्हें प्रयोग की कसौटी पर कसता है। मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में रखने का श्रेय इसी शाखा को है। इस मनोविज्ञान की अपनी प्रयोगशालाएँ होती हैं जिनमें विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं, जैसे- ध्यान, सीखना, स्मृति, चिन्तन, तर्क, अवधान, प्रत्यक्षीकरण, विकास में आनुवांशिकता तथा वातावरण के अपेक्षित महत्व, बुद्धि मापन, उत्प्रेरणा आदि पर प्रयोग किये जाते हैं। प्रयोगशालाओं में मानव तथा पशु दोनों पर प्रयोग किये जाते हैं तथा प्रयोग करने के लिए कृत्रिम एवं नियन्त्रित वातावरण उत्पन्न करना आवश्यक होता है।

सैन्य मनोविज्ञान (Military Psychology)

मनोविज्ञान की इस शाखा में मनोविज्ञान के नियमों एवं सिद्धान्तों का उपयोग सैन्य जगत की गतिविधियों में वांछित परिणाम प्राप्त करने हेतु किया जाता है। सैन्य विज्ञान (Military Science) के विद्यार्थियों को यह एक प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इसके अन्तर्गत जिन विषयों को लेकर आगे बढ़ा जाता है उनमें से कुछ प्रमुख हैं-सेना के विभिन्न अंगों में सिपाही तथा अफसरों के रूप में योग्य तथा कुशल व्यक्तियों का चुनाव कैसे किया जाए, युद्ध में तथा युद्ध के बाहर जवानों तथा अफसरों के हौंसले कैसे बुलन्द रखे जायें, शत्रु को प्रोपेगंडा तथा अन्य मनोवैज्ञानिक उपायों के द्वारा किस प्रकार शिरकत देने की कोशिश की जाए, अफसरों में कुशल नेतृत्व क्षमता कैसे विकसित की जाए, सैन्य संचालन तथा कुशल प्रबन्ध हेतु क्या कदम उठाये जायें, विषय परिस्थितियों तथा स्थानों में भली-भाँति समायोजित रखने हेतु मनोवैज्ञानिक रूप से क्या उपाय किए जाएँ, इत्यादि इत्यादि।

पशु मनोविज्ञान (Animal Psychology)

मानव मन को पशु मन की भूमिका में सरलता से समझा जा सकता है। इस मनोविज्ञान में पशुओं के मस्तिष्क व व्यवहारों का अध्ययन करके उसकी मानव के व्यवहारों से तुलना की जाती है। इसीलिए इसे तुलनात्मक मनोविज्ञान भी कहते हैं। मनोविज्ञान के बहुत-से प्रयोगों को मानव पर करना सम्भव नहीं होता। जैसे- वीजमान (Weismann) ने कई पीढ़ियों तक चूहों की दुम काट कर देखा कि उनके बच्चे दुम सहित ही पैदा होते हैं। इससे उसने यह निष्कर्ष निकाला कि हमारे शारीरिक परिवर्तन बच्चों में संक्रमित नहीं होते। इसी प्रकार किसी पशु के मस्तिष्क के किसी भाग को निकालकर उसके प्रभाव का प्रक्षेपण करना आदि अनेक प्रयोग हैं जो मनुष्यों पर सम्भव नहीं हैं। इस तरह यह मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण विषय माना जाता है।

शारीरिक मनोविज्ञान (Physical Psychology)

इस मनोविज्ञान के अन्तर्गत नाड़ी मण्डल, माँस-पेशियाँ, ज्ञानेन्द्रियों, ग्रन्थियों आदि के विषय में अध्ययन किया जाता है। इसमें हम उन्हीं शारीरिक क्रियाओं का अध्ययन करते हैं जिनका प्रभाव मानसिक क्रियाओं पर पड़ता है।

स्वास्थ्य मनोविज्ञान (Health Psychology)

मनोविज्ञान की इस शाखा में मनोविज्ञान के नियमों, तथ्यों एवं सिद्धान्तों का प्रयोग शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण करने, अस्वस्थता तथा बीमारियों से अपना बचाव करने तथा सभी प्रकार से निरोग तथा सबल बने रहने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त अस्वस्थ एवं बीमारियों से आक्रान्त होने पर किस तरह पुनः अच्छे स्वास्थ्य की ओर लौटा जा सकता है इसके लिये भी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करने में इस प्रकार की शाखा का अध्ययन काफी सहायक होता है। मनोवैज्ञानिक कारण जैसे चिन्ता, भय, निराशा, क्रोध और मानसिक तनाव बीमारियों का कारण कैसे बनते हैं तथा उनसे किस प्रकार दूर रहकर स्वस्थ रहा जाता है आदि ऐसी बातों की विवेचना स्वास्थ्य मनोविज्ञान की परिधि में ही आती है।

मनोमिति (Psychometrics)

मनोविज्ञान की इस शाखा में मन, मस्तिष्क तथा व्यवहार के विभिन्न पहलुओं के वस्तुनिष्ठ मापन से सम्बन्धित परीक्षणों तथा तकनीकों के निर्माण एवं उपयोग की बात की जाती है। विभिन्न प्रकार के बुद्धि परीक्षणों, रुचि तथा अभिरुचि परीक्षणों, अभिवृत्ति मापन स्केल तथा व्यवहारगत विशेषताओं के मापन से जुड़े हुए परीक्षणों के निर्माण, मानकीकरण (Standardization) तथा उपयोग का वर्णन और व्याख्या करना इस प्रकार के मनोविज्ञान का उद्देश्य होता है। इस कार्य में जिस के सांख्यिकी (Statistical) तथ्यों, संप्रत्ययों एवं गणना कार्य की सहायता ली जाती है उसका ज्ञान प्रदान करना भी इस प्रकार के मनोविज्ञान के अन्तर्गत ही आता है।

शुद्ध मनोविज्ञान (Pure Psychology)

मनोविज्ञान के सामान्य नियमों एवं सिद्धान्तों का अध्ययन इस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है। विभिन्न व्यावहारिक क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्ति शुद्ध मनोविज्ञान में प्रतिपादित सिद्धान्तों का प्रयोग अपने-अपने क्षेत्रों में करते हैं। इस मनोविज्ञान में नियमों एवं सिद्धान्तों का क्या और कहाँ अनुप्रयोग होगा, इसका ध्यान नहीं रखा जाता है।

नैदानिक मनोविज्ञान (Clinical Psychology)

ऐसे व्यक्ति जो वातावरण के साथ सामंजस्य करने में अपने को अयोग्य अनुभव करते हैं, उनकी नैदानिक मनोविज्ञान सहायता करता है। हमारे बहुत से असाधारण व्यवहारों एवं असाध्य रोगों के मानसिक कारण होते हैं जो व्यक्ति को विक्षिप्त, स्नायु रोगी एवं असाधारण बना देते हैं। मनोविश्लेषणवादियों ने इसमें महत्वपूर्ण कार्य किया है। बहुत से रोगी ऐसे होते हैं जिनके रोग का कारण शारीरिक न होकर मानसिक होता है। इन्हें प्रायः शारीरिक रोगों के डॉक्टर ठीक करने में असमर्थ होते हैं। इन मानसिक रोगों की चिकित्सा करना नैदानिक मनोविज्ञान का कार्य है।

औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology)

भारतवर्ष में बड़ी तेजी से औद्योगीकरण हो रहा है। इन उद्योगों ने समाज में अनेक समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। उद्योग- धन्धों के अन्दर भी बड़ी-बड़ी समस्याएँ हैं। नियोक्ता चाहता है कि वह मजदूरों से अधिक से अधिक काम ले और उसका उत्पादन खूब बढ़े तथा मजदूर चाहते हैं कि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ उनकी सुविधाएँ भी बढ़ें। इन औद्योगिक संघर्षों का निदान एवं उपचार औद्योगिक मनोविज्ञान करता है। इसके अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि उपभोक्ता किस प्रकार की वस्तु पसन्द करता है, उत्पादित वस्तुओं का विज्ञापन किस ढंग से आकर्षक बनाया जा सकता है, कर्मचारियों को अधिक उत्पादन के लिए किस प्रकार उत्प्रेरित किया जाना चाहिए आदि।

शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)

मनोविज्ञान का प्रयोग बहुलता से होने के कारण अब शिक्षा मनोविज्ञान को मनोविज्ञाम की एक शाखा के स्थान पर एक स्वतन्त्र विषय मान लिया गया है और इसका अध्ययन एक स्वतन्त्र विषय के रूप में किया जाता है। इसके अन्तर्गत शैक्षिक परिस्थितियों में बालक के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। बालक के शारीरिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा बौद्धिक विकास का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान का मुख्य क्षेत्र है। बच्चों के सीखने, तर्क करने, चिन्तन करने आदि के नियमों का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान का ही क्षेत्र है।

राजनीतिक मनोविज्ञान (Political Psychology)

मनोविज्ञान की इस शाखा के अन्तर्गत राजनीतिक नेताओं एवं अधिकारियों तथा सामान्य व्यक्तियां के व्यवहारों के बीच सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। इस शाखा के अन्तर्गत प्रभावशाली राजनैतिक रणनीतियाँ, राजनैतिक नेतृत्व, राजनैतिक विद्रोह, दलबदल आदि के पीछे छिपी मानव अभिप्रेरणाओं एवं इच्छाओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

सामुदायिक मनोविज्ञान (Community Psychology)

प्रत्येक समुदाय का अपना मनोविज्ञान होता है। उस समुदाय में रहने वाले एक विशेष ढंग से व्यवहार करते हैं, उनके समायोजन का अपना एक अलग तरीका होता है। सामुदायिक मनोविज्ञान की जानकारी न केवल उस समुदाय से सम्बन्धित व्यक्तियों, उनके व्यवहार तथा परिवेश को समझने में सहायक सिद्ध हो सकती है बल्कि इससे उनकी प्रगति सम्बन्धी उपायों पर भी प्रभावी ढंग से पहल की जा सकती है। यही कारण है कि समाजशास्त्र के विद्यार्थियों, समाज कार्यकर्ता तथा शोधकर्ताओं के लिए इस प्रकार के मनोविज्ञान का ज्ञान काफी आवश्यक माना जाता है।

उपभोक्ता मनोविज्ञान (Consumer Psychology)

मनोविज्ञान की यह शाखा उपभोक्ताओं के व्यवहार को उनकी अपना परिस्थितियों तथा वस्तुओं के उपभोग सम्बन्धी वातावरण के सन्दर्भ में अध्ययन करती है। इस प्रकार का असर माल बनाने वाली कम्पनियों तथा वस्तु विक्रेताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। अपने माल तथा उत्पादन का विज्ञापन करने में भी उन्हें उपभोक्ता मनोविज्ञान से सम्बन्धित बातें बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं। उपभोक्ता जिस तरह की वस्तुएँ चाहता है तथा जैसा व्यवहार चाहता है उसका उपयोग करके ही बिक्री से जुड़े हुए दलाल, एजेन्ट तथा दुकानदार अधिक-से-अधिक फायदा उठा सकते हैं तथा उत्पादन उपभोक्ता की माँग तथा पसन्द के अनुसार किया जा सकता है। आजकल उपभोक्ता अदालतों (Consumer Courts) में भी उपभोक्ता मनोविज्ञान से जुड़ी हुई बातें विभिन्न प्रकार के व्यापारिक झगड़ों के निपटारे में काफी सहायक सिद्ध हो रही हैं।

वायुदिक् मनोविज्ञान (Aerospace Psychology)

इस शाखा के अन्तर्गत व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले उन परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है जबकि वे दिक् (Space) में काफी ऊँचाई पर वायुयान में कार्यरत होते हैं। जब व्यक्ति पृथ्वी से अधिक ऊँचाई पर चला जाता है तो वहाँ उसे पूरी तरह से भिन्न मौसम तथा पर्यावरण का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में उनके व्यवहार में पूर्णतः परिवर्तन आ जाता है। समस्यात्मक पहलुओं तथा उनके यथोचित समाधान हेतु इस मनोविज्ञान में अध्ययन किया जाता है।

अपराध मनोविज्ञान (Crime Psychology)

व्यक्तियों की मनोदशा और व्यवहार का अध्ययन कर अपराधी का पता लगाना और अपराधी के अपराध करने के मूल में उपस्थित कारणों का पता लगा कर उसके आचरण में सुधार लाने का प्रयत्न यह शाखा करती है।

न्यायिक मनोविज्ञान (Forensic Psychology)

न्यायिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोविज्ञान तथा कानून दोनों के सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। यह जानने के लिए कि किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जा सकता है कि नहीं, मनोवैज्ञानिक निदान (Psychological Diagnosis) की भूमिका अहम होती है। जेल के अन्दर मनोवैज्ञानिक एक चिकित्सक के रूप में कार्य करते हैं। पुलिस विभाग द्वारा अकसर मनोवैज्ञानिकों की सेवा इस उम्मीद से ली जाती है कि वे उन्हें जटिल मानव इच्छाओं एवं अभिप्रेरणों को ठीक ढंग से समझने में मदद करेंगे। मनोवैज्ञानिक शोधों का प्रयोग कभी- कभी जटिल न्यायिक निर्णय लेने में सफलतापूर्वक किया जाता है।

सारांशतः मनोविज्ञान के क्षेत्र की दृष्टि से प्राणी-भेद, कार्यक्षेत्र, मनोविज्ञान की प्रकृति, आयु, मानव प्रकृति आदि सभी दृष्टियों से मनोविज्ञान के क्षेत्र से प्राणी-जगत का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं बचता। जहाँ प्राणी है वहीं मनोविज्ञान है।

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